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आर्टिकल 370 हटने के बाद अब राहुल गाँधी भी कश्मीरी पंडित हो गए

वरिष्ठ पत्रकार विनोद मिश्रा की कलम से ….

जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा ख़तम होने और आर्टिकल 370 निरस्त होने के दो साल बाद राहुल गाँधी का यह पहला जम्मू कश्मीर का दौरा था। माता वैष्णो देवी के दरबार में इंदिरा जी भी गयी थी सो राहुल जी भी जय माता दी कहते हुए दरवार पहुंचे लेकिन इंदिरा जी ने कभी नहीं कहा कि वे कश्मीरी पंडित हैं। राहुल गाँधी ने इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए साफ़ किया है कि उनका परिवार कश्मीरी पंडित समुदाय से आता है। राहुल गांधी ने कहा कि जब भी मैं जम्मू-कश्मीर आता हूं, मुझे लगता है कि मैं घर आ गया हूं। वैसे सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा लिखने वाले अल्लमा इक़बाल का भी सरोकार कश्मीर के पंडित खानदान से ही माना जाता है। मुझे लगता है कि हर भारतीय को कश्मीर अपना घर जैसा लगता है लेकिन अफ़सोस राहुल जी के पुरखों ने कश्मीर से अपनत्व को आर्टिकल 370 और 35 A लगाकर कम कर दिया था । कश्यप ऋषि, कनिष्क , शंकराचार्य और अभिनव गुप्त के कश्मीर से भारत का प्राचीन सम्बन्ध हटाकर हमारा परिचय 1948 के बाद वाला जम्मू कश्मीर से कराया गया था। जाहिर है कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पंडित भी अपना घर बार छोड़ने को मजबूर हुए । विशेष राज्य का दर्जा ख़तम होते ही भारत को जम्मू कश्मीर एक बार फिर अपना लगने लगा है और राहुल गाँधी भी अपने परिवार को कश्मीरी पंडित समुदाय से जोड़ने लगे हैं।

आज़ादी के बाद भारत का संबंध कश्मीर से 1948 के इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन से पारिभाषित किया गया। दुनिया के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगनी 300 ई पू में कल्हण ने लिखा है कि आप कश्मीर के किसी इलाके में घूम आये हर इलाका तीर्थ क्षेत्र है आज भी हजारों वर्ष बाद कश्मीर में भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की झांकी खंडहरों ,मंदिरो,बौद्ध स्तूपों में दिखाई देगी। देश का पहला सूर्य मंदिर और शारदा मंदिर कश्मीर में ही है जिसका अस्तित्व मिटाने की कोशिशें विदेशी आक्राणताओं ने कई बार की थी। आप वादी ए कश्मीर में सड़क मार्ग से आये हो या हवाई मार्ग से श्रीनगर में आपकी नजर सबसे पहले सैकड़ो वर्ष पुराने शंकराचार्य मंदिर पर ही पड़ेगी। यह जम्बूद्वीपे भारत खंडे के भाव का दर्शन था कि सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत केरल से चला एक विद्वान सन्यासी शंकराचार्य ‘नमस्ते शारदा देवी ,कश्मीर मंडला वासिनी ‘का साक्षात् दर्शन के लिए पैदल कश्मीर पहुंच गए । केरल के कालड़ी से चला एक सन्यासी के लिए आखिर कश्मीर में क्या था जो उन्होंने वहां अपना बहुमूल्य समय दिया और महीनों वादी में बिताये। शिव और शक्ति को लेकर उन्होंने सौंदर्य लहरी की रचना कश्मीर में ही की थी। क्या हमने सोचा है कि सातवीं सदी के मशहूर राजा ललितादित्य ने कश्मीर में विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था । लेकिन आज़ादी के बाद पंडित नेहरू बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के शेख अब्दुल्ला के तर्क में फंस गए।
मार्तण्ड और अवन्तिवर्मन ने ऐसा ही भव्य सूर्य मंदिर अवंतीपुरा में बनवाया। उतर भारत के धर्म अध्यात्म और सांस्कृतिक विकास का केंद्र लम्बे अरसे तक कश्मीर ही बना रहा। क्या हम अभिनव गुप्त को भूल सकते हैं जिसे कश्मीर का शंकराचार्य कहा जाता है। वह कौन सी ताक़त थी जो आदि शंकर को हिमालय की गुफा में स्थित बाबा अमरनाथ को दर्शन के लिए प्रेरित किया था ऐसा क्यों हुआ था जब कोलकोता से कन्याकुमारी के लिए स्वामी विवेकानंद निकले तो अपनी यात्रा कश्मीर और बाबा अमरनाथ की गुफा के दर्शन के बाद ही समाप्त की। यह भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना है जिसका सूत्र कश्मीर में भी है। शायद वैष्णो देवी यात्रा क्रम में भारत के इस विराट वैभव से साक्षात्कार राहुल गाँधी को भी हुआ और उन्हें शायद एहसास हुआ होगा कि उनके परिवार ने कश्मीर मामले में भारत के प्राचीन गौरव को क्षीण किया है और वे अपने को पंडित बताने लगे ।

जम्बूद्वीपे भरतखण्डे सदियों से भारत का संकल्प मंत्र रहा है। आज भी आप हर संकल्प में इस मन्त्र को दोहराते हैं। यानी भारत जिसे आज भौगोलिक मानचित्र में एक मुल्क परिभाषित की गयी है दरअसल यह उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक मानचित्र हजारों वर्ष पहले की है। पौराणिक शास्त्रों के भौगोलिक तथ्यों में जम्बूद्वीप में वर्तमान एशिया के अधिकांश हिस्से शामिल थे । तीन युद्धों में अपनी करारी शिकस्त के बाद पाकिस्तान ने सीधी जंग के बदले कश्मीर में आतंकवाद और अलगवाद की जड़ जमाने के लिए वादी में सेपरटिस्ट की हवा तेज की। लेफ्ट लिबरल पत्रकार, बुद्धिजीवी ,लेखक ,पॉलिटिशियन सबने इस पाकिस्तानी परस्त इकोसिस्टम को सेक्युलरिज्म की चासनी में डुबोकर फेक नैरेटिव तैयार किया और आतंकी हिंसा को आज़ादी ,मानवाधिकार जैसे शब्दों में गढ़कर पूरी दुनिया में भ्रम फैलाया। यह भ्रम ऐसा था कि कश्मीर की सबसे पुरानी सभ्यता के साक्षी और बाशिंदे मसलन पंडित टिका लाल टपलू , जस्टिस नीलकंठ गंजू , प्रेम नाथ भट्ट, सर्वानंद कौल, लस्सा कौल से लेकर 2020 में सरपंच अजय पंडिता जैसे सैकड़ो पंडितों की मौत हुई। पिछले 30 वर्षों से लाखों परिवारों के पलायन के लिए क्या राहुल गाँधी ने कभी अफ़सोस जताया है ? क्या किसी देशी विदेशी मंचों से कभी कश्मीर में हजारों बेगुनाहों की मौत और अल्पसंख्यकों के ह्यूमन राइट्स का मुद्दा बहस में लाया गया था ? क्या कांग्रेस की हुकूमतों ने बाल्मीकि समाज के बच्चों को लेकर कभी कोई फ़िक्र की ? क्या किसी ने कभी पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की चिंता की ? अगर राहुल जी के परिवार ने वर्षों तक सत्ता में रहते हुए कभी इन पीड़ितों की चिंता नहीं की तो उनका परिवार कश्मीरी पंडित नहीं हो सकता उनके परिवार का सरोकार परिवार सिर्फ सत्ता से हो सकता है । जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन अक्सर कश्मीर के अनुभव को बताते थे कि आप कश्मीर में जहाँ भी कदम रखेंगे आपको मिनी इंडिया मिलेगा। आपको यहाँ के हर गाँव ,शहर के प्राचीन अवशेषों में भारत की सभ्यता दिखेगी। हर प्राचीन धार्मिक स्थलों में भारत की सांस्कृतिक, आध्याकत्मिक्ता की खुशबू मिलेगी। जगमोहन अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि आप अगर अमरनाथ गुफा दर्शन के लिए गए हों तो पहलगाम से पवित्र गुफा के रूट में आपको चंदनवारी,पिषु घाटी ,शेषनाग ,पंचतरणी ऐसे दर्जनों अद्भुत जगह मिलेंगे जो आपको सत्यम शिवम् सुंदरम की अलौकिकता का एहसास करएगा। सदियों से भारतीय परंपरा में शिवत्व की खोज में यहाँ लोग आते रहे हैं वह चाहे शंकराचार्य हों स्वामी विवेकानंद हों या राहुल गाँधी । फिर भी अगर कांग्रेस पार्टी और उनके नेता जम्मू कश्मीर को आर्टिकल 370 से जोड़ने की कोशिश करते हैं तो माना जाएगा उनके लिए भारत का इतिहास 1947 से शुरू होता है। उन्हें शायद याद रखनी चाहिए कि जिस देश को अपनी संस्कृति पर गौरव नहीं है उस देश का वर्तमान नहीं होता सिर्फ तारीख होता है।

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