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कुछ कहूं…लोकतंत्र में बाबूराज…

दिनेश सिंह

बाबू जो नौकरशाही का अहम अंग यानी दिल कहा जाता है। वह विधायिका एवं नौकरशाही के अधिकारियों के बीच सामंजस्य कायम करने में रज्जु का काम करता है और जनता के हितों का मोलभाव करके उससे उपजे धन को स्वयं सहित अधिकारी की झोली में डालता है ।

अब तक के सबसे बड़े-बड़े कारनामों का भार बाबुओं के कंधे पर है। कभी-कभी तो कुछ अवांछित सामाजिक कार्यकर्ताओं ,मीडिया समूहों या चिपकू नेताओं जो कोर्ट केस के द्वारा अधिकारियों को चारों ओर से घेर लेने के बावजूद भी इन बाबुओं को शहीद कर बड़ा से बड़ा मामला निपटा लिया जाता है।

“हर मर्ज की दवा है बाबू “ यानि विभागीय हर पेंचीदगियों का एकमात्र समाधान बाबू है। कई बार बाबू निवारण का अभियान चलाया गया नारा दिया गया कि देश से इंस्पेक्टर राज और बाबू राज को खत्म कर दिया जाए। लेकिन यह मात्र कपोल कल्पना है इन दोनों विभूतियों पर तो यह देश खड़ा है । संविधान का अनुपालन बिना इनके संभव नहीं। प्रजातंत्र में प्रजा को अधिकारी तक पहुँच में बाधक है बाबू। इनकी कलम की मार से कभी कभार शिथिल अधिकारी भी नप जाते हैं।


हालिया एक मामला उत्तर प्रदेश में पूर्व सरकारों द्वारा प्राथमिक शिक्षा में फर्जी ढंग से नियुक्ति पाने वाले एक हजार शिक्षक ,जो समाज सुधारक के रूप में नियुक्त विद्यालयों में छात्रों को नैतिकता ,सुचिता ,पवित्रता का पाठ पढ़ाते हैं जिन्होंने दूसरों की डिग्रियों (उपाधियों )की आड़ लेकर नौकरी कर रहे थे। जिसमें परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय में एक बाबू को एसटीएफ द्वारा घेरा गया।

प्रश्न वही रटा रटाया कि लगभग दोनों वैकेंसियों में हुए डेढ़ लाख भर्तियों के घोटालों में मात्र एक बाबू ही मिला। सोचिए कितना होनाहार बाबू है जिस पर पूरा परीक्षा नियामक विभाग ही टिका था । बाबू के हटते ही लगता है नियामक विभाग ही ढह जाएगा और योगीराज के डंडे से नया परीक्षा नियामक विभाग खड़ा किया जाएगा। लेकिन बाबू तो बाबू ही है उसके रक्षार्थ लाभान्वित अधिकारी बैक डोर से उसे बचाने की हर संभव कोशिश करेंगे। वे कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेंगे। क्योंकि बाबू का मुंह खुला तो अच्छे-अच्छे सफेदपोश माननीयों पर लिखी गई स्याही का दाग तो लगेगा ही। लेकिन बाबू एक ऐसा जीव है जो अपने बचने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है ।

उसके बाद एक अंतिम विकल्प कोर्ट तो है ही । ऐसे कई बेमिसाल उदाहरण हैं बाबू राज के। जिनके कारनामों से इस देश की कई संवैधानिक संस्थाएं अपने नए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से कई बिंदुओं की जांच करती हैं । लेकिन आप ही बताइए कि कौन सी ऐसी संस्था है इस देश में जहां पर बाबू नहीं है।

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