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Ghaziabad: चार वर्षों में क्या कर दिखाया जो वर्षों में ना हो पाया

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले प्रबुद्ध जन सम्मेलन में 96 पेज की पुस्तिका बांटी गई. और पुस्तिका में दावे तो बड़े-बड़े किए गए हैं। लेकिन एक भी विकास कार्य ऐसा नहीं दिखाया योगी सरकार ने जिसके लिए उन्हें याद किया जाए। हां यह सच है कि पूर्व की सरकारों द्वारा घोषित योजनाओं को पूरा किया गया, लचर बिजली, सड़क, परिवहन जैसी योजनाओं को गति प्रदान की गई। लेकिन विगत 70 सालों में बांध आधुनिक नये विश्वविद्यालय, सुसज्जित मेडिकल हॉस्पिटल, रोजगार के नए संसाधन, बड़ी नहरें ऐसी कालजई परियोजना का टोटा रहा है। खैराती योजना पहले की सरकारों ने भी बांटा और इस सरकार ने बेहतर बांटा। लेकिन खैरात से आम आदमी जी सकता है दौड़ नहीं सकता। आज युवा बेरोजगार है। हां घोषणाएं बहुत हुई हैं लेकिन पूरा कार्यकाल चला गया कई योजनाएं अभी भी फाइलों में दफन हैं. उन्हें वास्तविक रुप से जमीन पर अवतरित होने के लिए नई सरकार की जरूरत होगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केंद्र एवं राज्य सरकार के सहयोग से जेवर एयरपोर्ट एवं दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ आरआरटीएस कारी डोर प्रमुख योजना जिसे यादगार की श्रेणी में रखा जाएगा। लेकिन शहीद स्थल एवं इलेक्ट्रॉनिक सिटी मेट्रो विस्तार आगे नहीं बढा। कुछ बड़े शहरों में मेट्रो योजनाओं का कार्य चल रहा है जो समय की मांग है।

अब प्रश्न वही? क्यों चुना जाए भाजपा सरकार को। महंगाई ,गरीबी में बढ़ोतरी हुई, रोजगार के अवसर कम हुए ,पेट्रोल, डीजल, बिजली, टोल की दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई,  इंडियन रेलवे का कार्य व्यवहार प्राइवेट कंपनियों जैसा हो गया है। शयनयान, पैसेंजर किराए के बेस प्राइस में 50% से ज्यादा की बढ़ोतरी कर दिया गया है। शिक्षा का स्तर कमजोर हुआ है। विश्वविद्यालयों में शिक्षा की बेहद कमी है। कानून व्यवस्था की पोल जहरीली शराब, लूट, डकैती आदि घटनाएं खोल देती हैं। नागरिक सेवाओं में प्रयोग होने वाले पत्रों, लाइसेंसों की फीस में बढ़ोतरी के साथ साथ सुविधा शुल्क की दरों में इजाफा हुआ है और इंटरनेट- डिजिटल सेवाओं में सरकार को ज्यादा फायदा आम आदमी को कम या नुकसान हुआ है। परिवहन सेवाएं जर्जर है। वातानुकूलित शयनयान परिवहन सेवाएं महंगी हुई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में संसाधन की कमी जो संसाधन है उसका उपयोग भी नाकाफी। प्राइवेट हॉस्पिटलों को बढ़ावा निजी क्षेत्र की तरफ भागती भाजपा कैसे आम आदमी की हितैषी होगी। जबकि प्राइवेट सेक्टर की नाकामी कोविड में स्पष्ट दिखाई दी। जब लाशों के दहन के दर्शन पर रोक के लिए शमशान में निगमों को टीन से ढकना पड़ा। अंतेष्ठि की लंबी लाइन में माननीयों से सिफारिश लगवानी पड़ी।

आलम ये है कि सुशुप्तावस्था में जागृत विधायक जनों को विकास के लिए तालिका में नाली खडंजा के अलावा कोई और कार्य सूझ ही नहीं रहा। आज केंद्र सरकार विगत 70 सालों के बनाए गए उपक्रमों को लीज पर देकर किराया वसूलने की जुगत में है। देश को ऐसी जरूरत क्यों पड़ रही है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर जारी है। सरकार ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दे रही है सरकारी निगमों में नौजवान युवा 8 से 10000 रूपये मासिक पर काम करने को मजबूर है। सरकार इसे भी रोजगार देने पर अपनी पीठ थपथपा रही है। प्रदेश सरकार जानती है।   वर्तमान सरकार का ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसे याद किया जाए हां राष्ट्रप्रेम एवं हिंदुत्व के चश्मे से देखा जाए तो योगी सरकार का कार्यकाल सराहनीय रहा है।

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