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टूटने लगा BJP का तिलिस्म कई बड़े चेहरे सपा में हुए शामिल

बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है,

क्या वाकई में दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक दल की बुनियाद अब दरक रही हैं..?
क्या बीजेपी से नेताओं का मोह अब भंग होता जा रहा है?
क्या दलित शोषित और पिछड़ों का बीजेपी में तिरस्कार होता है ?

प्रवीण तिवारी, लखनऊ

मौर्य साहब अकेले ऐसे नहीं है जिन्होंने बीजेपी से किनारा किया है बल्कि बांदा के तिंदवारी से बीजेपी विधायक बृजेश प्रजापति कानपुर के बिल्हौर से बीजेपी विधायक भगवती सागर शाहजहांपुर से विधायक रोशनलाल वर्मा, यह वो नाम है जिन्होंने बीजेपी से इस्तीफे का ऐलान किया है। कहा जा रहा है कि और भी कई नाम है जो बीजेपी का दामन छोड़ सकते हैं। इसमें से पटियाली कासगंज के विधायक ममतेश शाक्य औरैया बिधूना से विधायक विनय शाक्य और बदायूं शेखुपुर से धर्मेंद्र शाक्य और विधायक नीरज मौर्या भी सपा का दामन थाम सकते हैं।

जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके साथ तीन भाजपा विधायकों ने बीजेपी का दामन छोड़ा है और उन पर आरोप मढ़ा है कि बीजेपी दलितों और पिछड़ों की विरोधी है। उससे उत्तर-प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया है। क्या वाकई में अब रिंग मास्टर के हंटर की तरह पार्टी में अनुशासन का पाठ पढ़ा कर लोगों की आवाज दबाने की कोशिशें अब दम तोड़ने लगी है। अब तक दबे कुचले शोषित पीड़ित और वंचितों के रहनुमा बनकर उनकी सियासत करने का दम भरने वाले लोग अब खुद को शोषित और पीड़ित बता कर इधर-उधर छिटकने लग गए हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पांच साल तक जिस सत्ता की मलाई चाटी तब क्या इन्हें उन शोषित और वंचित हो का हित नजर नहीं आया ?

स्वामी प्रसाद मौर्य जब खुद कैबिनेट मंत्री बने तब क्या शोषित और पिछड़ों का अपमान नहीं हो रहा था?
जब अपनी बेटी को भाजपा से सांसद बनवाया तब क्या शोषित और पिछड़ों का अपमान नहीं हुआ?
और अब जब उनके बेटे को टिकट देने से इनकार हो गया तब उन्हें शोषित और पिछड़ों का तिरस्कार नजर आ रहा है?
कुछ इसी तरह की कहानी बांदा के तिंदवारी विधानसभा से बृजेश प्रजापति की है। बृजेश प्रजापति लगातार विवादों में रहे रह रहकर कई बार उनको पार्टी की फटकार मिली और इस बार तय माना जा रहा था कि तिंदवारी से उनका टिकट कटेगा ही कटेगा, ऐसे में अब उन्हें पिछड़ों और दलितों के साथ अन्याय नजर आने लगा। भगवती सागर की अगर बात की जाए तो भगवती सागर बसपा सपा कांग्रेस के बाद अब बीजेपी का दामन थामे थे। कई सरकारों में मंत्री रह चुके भगवती सागर इस बार मंत्री न बनने से नाराज लग रहे थे। आखिरकार उन्होंने भी अपना पाला बदल लिया। इसी तरह ज्यादातर जिन विधायकों के इस्तीफा देने की खबरें हैं उनके टिकट कटना तय माना जा रहा था।

लेकिन यह टूट-फूट केवल बीजेपी के खेमे में नहीं लेकिन खबरें अब सपा के खेमे से भी आने लगी हैं। खबर यह भी आ रही है कि पूर्व मंत्री मनोज पांडे सपा से इस्तीफा दे सकते हैं। क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्या के समाजवादी पार्टी में आ जाने से ऊंचाहार से उनके बेटे को टिकट मिलने की संभावना है। अगर ऊंचाहार से स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे को टिकट मिला। तब भला मनोज पांडे का क्या होगा यही वजह है कि अटकलें लग रही हैं कि मनोज पांडे भी जल्द ही सपा का दामन छोड़ सकते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि चुनाव के समय दल-बदल आदर्शों से ज्यादा अवसर को प्राथमिकता देता है और अभी तो चुनाव शुरू हुआ है आगे आगे देखिए होता है क्या?

 

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