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कुछ कहूं… भाजपाई एकता की माला टूटी

दिनेश सिंह/ गाजियाबाद

भाजपा के जादुई झोले से विकसित पद विकास करके पुनः झोले में आ रहे हैं। पहले युवा मोर्चा विकास भंग हुआ फिर भाजपा ओबीसी मोर्चा में विवाद की हलचल तेज हुई फिर भंग पीकर किसान कमेटी भंग हुई।

इधर, हर सीट पर दावेदारों की संख्या बढ़ रही है। साहिबाबाद सीट से एक शर्मा दूसरे शर्मा को धकिया रहे हैं। तो, शहर सीट से माननीय बगल वाली सीट पर वक्र दृष्टि जमाए हुए हैं। सुना है कि बॉर्डर के माननीय जबरजस्ती मार्गदर्शक मंडल में डाल दिए जाएंगे। कुछ दिन के लिए और उत्तर में वॉच आवर बढ़ा दिया गया है। निगरानी जारी है। महानगर प्रभारी का कुछ भार ज्यादा ही हो गया है। आप के अवतरण दिवस का शोर लखनऊ तक पहुंचा। दरअसल, भाजपा नेतृत्व विपक्ष से ज्यादा अपने पक्ष से चिंतित है।

अब आयातित नेता के अंदर संस्कार का कच्छा ढूंढती बीजेपी को वो खरा संघी माल तो मिलेगा नहीं। जो था उसे सलाहकार मंडल में डालकर चमकदार शोपीस लाया गया तो, उस पर तो कोई भी ओंढनी डाल देगा। पद वितरण में बाहरी बनाम भीतरी की लड़ाई में हुए वैचारिक संघर्ष में कई अध्यक्ष की कुर्सी हिली, हिलना भी चाहिए। कई समर्पित पुराने संघी मर्मज्ञ कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब वह भाजपा नहीं रही भाजपा का कलेवर बदला है। चाल- चरित्र लबादा भी बदला है। निष्ठायें, अवसरवादी मानसिकता में परिभाषाएं बदली हैं। मुद्दा एवं एजेंडा बदल गया है। मगर 2022 का चुनाव उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश का भाग्य लिखता है। तो, एक स्पष्ट संकेत है कि गाजियाबाद की तरह भाजपाई माला की डोर हर जगह से कमजोर हुई होगी।

आंतरिक कलह गुटबाजी इस बार पूर्ण सत्ता का संकेत नहीं देती। हां विपक्ष कमजोर हो, ऐसा भी नजर नहीं आता। दरअसल, गाजियाबाद भाजपाई माला की कमजोर डोर टूट चुकी है। दाने जमीन पर गिरकर शोर करते हुए आवाज दे रहे हैं कि जब कोई पद क्रिएट ही नहीं था तो, लॉलीपॉप क्यों? पद की सियासत पार्टी नेतृत्व को कहीं भारी ना पड़ जाए।

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