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दिनेश सिंह, गाजियाबाद

पॉलिटिकल इंडस्ट्री में निवेश का मौसम

जी, हां दोस्तों, इस राजनैतिक उद्योग में धन के निवेश का उपयुक्त समय है। खासकर उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं अन्य राज्यों की परिस्थिति अनुसार क्योंकि जैसे बिटकॉइन को कई देशों ने मान्यता दी है। कुछ देने की होड़ में हैं, वैसे अप्रत्यक्ष तौर पर यह सर्वमान्य डिजिटल करेंसी है। उसी तरह राजनीति में, सत्ता से पैसा एवं पैसा से सत्ता, अब इसे सभी राजनीतिक दल दबी जुबान से सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहें हैं। जिस तरह केंद्र सरकार का घाटे का बजट घोषित होता है। उसी तरह राजनीतिक दलों का भी घाटे का बजट बनता है। कहां से कितना धन आएगा किन-किन मदों में जाएगा। बाकायदा फाइनेंस समिति इसका निर्धारण करती है। क्योंकि चुनाव में हर वह कृत्य किए जाते हैं। जिसे सामाजिक जीवन में दुर्गुण का पर्याय यही सज्जन नेतागण माइक पर कहते हैं। गाजियाबाद भी चुनावी रंगत में धीरे-धीरे आ रहा है। कई गैर राजनीतिक धनकुबेर इस बार वजन एवं मांग के अनुसार पार्टियों में फंड निवेश कर टिकट की दावेदारी में दिख रहे हैं। क्योंकि सत्तापक्ष के विधायकों को कुछ करने का मौका तो मिला नहीं अब निगम कार्य से कितना फोटो खिंचवा आएंगे अपनी निधि तो करो ना ने ले ली। प्रदेश की क्या देश की अर्थव्यवस्था खस्ता है। यहां तक कि अवस्थापना निधि विगत 2 साल से नगर निगम को नहीं मिली है। इसलिए शीर्ष नेतृत्व नए व्यक्तित्व पर ही मुहर लगाएगा, हो सकता है कि बाहरी वजनदार प्रत्याशी भी आ जाए। क्योंकि गाजियाबाद, नोएडा और उत्तर प्रदेश का साइन इन चेहरा है। इसलिए भाजपा अपना मुखौटा नहीं बिगाड़ेगी। वो मात्र जिताऊ प्रत्याशी को ही मैदान में उतारेगीं। रही बसपा एवं सपा तो इस बार पूरी मजबूती से मैदान में झंडा, डंडा, हौवा और पौवा से उतरेगी। क्योंकि विपक्ष के पास मोदी मैजिक के अवसान पर बोलने के लिए बहुत सामग्री है। तो, देखिए कितने धन बली एवं बाहुबली किन-किन पार्टियों में निवेश कर राजनीतिक उद्योग से अपना धन सूत समेत वसूल पाएंगे। क्योंकि यह अक्षर सा सत्य है कि चुनाव एवं लॉटरी में ज्यादा फर्क नहीं होता।

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