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यहां के भिखारी चला रहे ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ बस्ती का दादा ट्रेनिंग देने के साथ लगता है ड्यूटी, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वालों की जानें कितनी है आमदनी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के हर गांव, मोहल्ले और शहर, रेलवे प्लेटफार्म, बस स्टैंड के अलावा भीड़भाड़ इलाकों में आपको सुबह से लेकर देररात भिक्षा मांगते, बच्चे, बुजुर्ग, युवा व महिलाएं मिल जाएंगी। इन्हें लोग भिखारी कहते हैं और इनकी अपनी अजब-गजब की एक दुनिया है। भिखारियों की अपनी बस्ती है और खास नियम-कानून भी। हर बस्ती में उक दादा है, जिसके इशारे पर बस्तियां चलती हैं। दादा के कुछ खास लोग भिक्षा मांगने की ट्रेनिंग देते हें। भिक्षा की डिग्री देने के बाद उनकी अलग-अलग इलाकों में तैनाती की जाती है। हर भिखारी की 15 दिन के बद शिफ्ट चेंज कर दी जाती है। अगर लखनऊ की बात करते तो चिनहट की बलरामनगर, अलीगंज, निशातगंज और सदर की डेरा बस्ती के अलावा शहर के कई अन्य स्थानों पर भिखारी रहते हैं और इनके घरों पर टीवी-कूलर के साथ हर साजो समान उपलब्घ है।

टोलियों का निर्धारण जगह देखकर किया जाता
कहते हैं दुनिया में सबसे ज्यादा भिखारी पाकिस्तान में हैं, लेकिन इनकी संख्या भारत में भी कम नहीं। लखनऊ में कई बस्तियां हैं, जहां भिखारी रहते हैं। भिखारियों को बस्ती का दादा ट्रेनिंग देता है। इसके बाद उन्हें काम सौंपा जाता है। हर भिखारी की 15-15 दिन के अंदर शिफ्ट चेंज कर दी जाती है। खास बात यह कि टोलियों का निर्धारण जगह देखकर किया जाता है। जैसे कि धार्मिक स्थल के बाहर महिलाओं व बच्चों की संख्या बढ़ा दी जाती है जबकि पर्यटन स्थलों पर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वालों को भेजा जाता है। यही दादा पिक एंड ड्रॉप सर्विस भी संभालते हैं। हर टोली के लिए एक ई-रिक्शा या टेंपो होता है। जब शाम को टोलियां लौटती हैं तो दादा वसूली करते हैं और पूरा ध्यान रखते हैं। एक तरह से भिखारियों की प्राईवेट कंपनी है और उसमें काम करने, काम देने, काम देखने वाली की पूरी फौज होती है।

ऐसे तैयार किए जाते हैं भिखारी
भिखारियों का प्रशिक्षण कैसे होता है, इसकी जानकारी के लिए हमारी टीम दुबग्गा पहुंची। से बाबा के भेष में एक 50 साल का भिखारी मिला। उससे पूछा कि, आप ये काम क्यों करते हो, तो उसने कहा कि, भैया, पहले बाबा भिक्षा मांगते थे। फिर इस करोबार में पिता उतर आए। पिता के निधन के बाद उनके इस काम को हम आगे बढ़ रहे हैं। भिखारी ने कहा भैया, आसान नहीं भीख मांगना। भिखारी ने बताया कि, बड़ा कठिन होता है ये सब। कुछ बच्चे काम जल्दी समझ जाते हैं। पर, एक महीना तो लग ही जाता है उन्हें सबकुछ सिखाने में। सुबह जल्दी उठना है, बाल बिखरा और गंदा रखना है ये सब सिखाया जाता है। बच्चे जिद करते हैं। पर, धीरे-धीरे सब सीख जाते हैं। बाबूजी, भूख लगी है… भैया कुछ पैसा दे दो … जैसी लाइनें रटाई जाती हैं। फिर ऐसा बोलते समय वह एकदम दीन-हीन नजर आए उसकी ट्रेनिंग दी जाती है। वहीं ट्राईसाइकिल पर बैठकर भीख मांगने वाले रमेश ने बताया कि दिव्यांग बनकर अच्छी भीख मिल जाती है। मजबूरी में ऐसा करता हूं।

एक हजार की होती आमदनी
बलरामनगर बस्ती के भिखारी अतर सिंह ने बताया कि कुछ एनजीओ वाले पढ़ाने आते हैं, उनसे बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दिया जाता है। उनकी बस्ती में करीब 50 घर हैं और आबादी करीब 500 है। इनमें करीब 200 महिलाएं, 150 बच्चे व शेष पुरुष हैं। पुरुष शहर के अलावा अयोध्या, मथुरा, काशी और आगरा जैसे उन शहरों में भी जाते हैं, जहां विदेशी पर्यटकों से मोटी भीख मिलने की उम्मीद रहती है। यहां अंग्रेजी की जरूरत पड़ती है। एक महिला भिखारी ने बताया कि वो पहले पॉलीटेक्निक पर भीख मांगती थीं, अब बटलर चौराहे पर घूम-घूमकर भीख मांगती हैं। बस्ती के बड़े लोग ऐसा करने को कहते हैं क्योंकि एक बार लोग पहचान जाएं तो भीख नहीं देते। बस स्टैंड के बाहर भीख मांग रहे एक भिखारी ने बताया कि, ये उसका खानदानी पेशा है। बच्चे भी सुबह भीख मांगने के लिए निकल जाते हैं। तीन बच्चे और मैं खुद दिनभर में एक हजार रूप्ए कमा कर घर ले जाता हूं।

भीख की रकम के हिसाब से पूरा नेटवर्क चलता
सदर इलाके की डेरा बस्ती में इतनी संकरी गलियां हैं कि पैदल चलकर ही निकला जा सकता है। इन गलियों में रहने वाले सभी लोग भिक्षा मांगते हैं। डेरा बस्ती के महेश ने बताया कि बस्ती में शाम को दिनभर मिली भीख का हिसाब लिया जाता है। वहीं जिस घर के पुरुष बाहर भीख मांगने जाते हैं, उनके परिवार की जिम्मेदारी भी दादा संभालते हैं। किसी की तबीयत खराब हो तो इलाज करवाते हैं। महेश बताते हैं, भिखारियों की हर बस्ती एक दूसरे से संपर्क में रहती है। इलाके तय रहते हैं और कभी कोई दूसरे के इलाके में नहीं जाता है। भीख की रकम के हिसाब से पूरा नेटवर्क चलता है। जैसे मंदिर के बाहर मंगलवार, शनिवार व बृहस्पतिवार को ज्यादा भीख मिलती है। पॉलीटेक्निक, चारबाग, खम्मनपीर मजार, इमामबाड़ा जैसी जगहों पर भी अधिक भीख मिलती है। यहां बस्ती का मुखिया अपने खास भिखारियों को लगाकर वसूली करता है।

हरदिन अगल-अलग पकड़े पहने हैं भिखारी
लंगड़ बाबा सोमवार को मनकामेश्वर धाम, मंगलवार को हनुमानसेतु, गुरुवार को खम्मन पीर बाबा की मजार तो शनिवार को कपूरथला के शनि मंदिर के सामने बैठते हैं। मंगलवार को वह गेरुआ रंग का तो शनिवार को काला, गुरुवार को हरे कपड़े ही पहनते हैं। अलग-अलग दिन अलग-अलग रंग के कपड़े का क्या असर होता है, इस सवाल पर वह कहते हैं धार्मिक स्थलों के आसपास अगर अच्छे कपड़े और वहां के हिसाब के रंग के कपड़े पहने तो अच्छा पैसा मिलता है। बिना मांगे भी मिल जाता है। नहीं तो लोग भिखारी समझकर भगा देते हैं। लंगड़ बाबा बताते हैं, एक भिखारी रोजाना 800 से एक हजार रुपये तक ले आता है। घर के सदस्यों की संख्या के अनुसार कमाई घटती-बढ़ती रहती है। एक बस्ती औसतन 50 हजार रुपये तक रोज कमा लेती है। कोई बड़ा धार्मिक आयोजन होने पर कमाई बढ़ भी जाती है।

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