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आजादी का अमृत महोत्सव :116 वर्ष के तिरंगे के सफर की पढ़ें इनसाइड स्टोरी, जानें 1947 से पहले क्यों किए गए छह बदलाव

लखनऊ। देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। देशभर में तिरंगा यात्रा निकल रही हैं, जो 15 अगस्त का बदस्तूर जारी रहेंगी। गांव से लेकर गली-मोहल्लों में लोगों के घरों पर तिरंगा झंडा शान से लहरा रहा है। अमृत महोत्सव पर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जश्न-ए-आजादी की धूम है। इस महोत्सव के अवसर पर हम आपको तिरंगे की यात्रा से रूबरू कराने जा रहे हैं। बीते 116 साल में छह बार देश का झंडा बदला गया है। हालांकि, ये बदलाव आजादी मिलने तक ही हुए। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में आखिरी बदलाव 1947 में हुआ था, उस वक्त इसे तिरंगे का नाम भी दिया गया।

मना रहे जश्न-ए-आजादी
अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का बिगुल 1856 में फूंका गया। देशभर में ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए घर से निकल पड़े। सैकड़ों क्रांतिकारियों ने आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। भारतीयों में जश्न का महौल था। कानपुर के क्रांतिकारियों ने 14 अगस्त 1947 को मेस्टन रोड स्थित तिरंगा फहरा दिया। अगले दिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने तिरंगा फहराया। इसके बाद भारत ने कई ऐतिहासिक कदम उठाए। पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गर्व से लाल किले से तिरंगे को फहराया। पर ये तिरंगा किसने, कब और कैसे अस्तित्व में आया। तिरंगे के 116 वर्ष के सफर की कहानी हम आपको बताते हैं।

कोलकाता में फहराया गया था पहला झंडा
1906 में देश का पहला प्रस्तावित झंडा सामने आया। जिसे सात अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक, कलकत्ता (अब ग्रीन पार्क, कोलकाता) में फहराया गया था। इस झंडे में तीन – हरे, पीले और लाल रंग की पट्टियां थीं। इसमें ऊपर की हरे रंग वाली पट्टी में आठ कमल के फूल थे, जिनका रंग सफेद था। बीच की पीली पट्टी में नीले रंग से वन्दे मातरम् लिखा हुआ था। इसके अलावा सबसे नीचे वाली लाल रंग की पट्टी में सफेद रंग से चांद और सूरज के चित्र अंकित थे।

पेरिस में भारत का नया झंडा फहराया
1907 में देश का दूसरा नया झंडा प्रस्तावित किया गया। पहले पहले झंडे में कुछ बदलाव करके मैडम भीकाजीकामा और उनके कुछ क्रांतिकारी साथियों, जिन्हें निर्वासित कर दिया गया था, ने मिलकर पेरिस में भारत का नया झंडा फहराया था। यह झंडा भी देखने में काफी हद तक पहले वाले के जैसा ही था। लेकिन इसमें केसरिया, पीले और हरे रंग की तीन पट्टियां थी। बीच में वन्दे मातरम् लिखा था। वहीं, इसमें चांद और सूरज के साथ आठ सितारे भी बने थे।

तीसरे झंडे को तिलक ने फहराया
1917 में देश के लिए एक और नया झंडा प्रस्तावित किया गया। इस नए ध्वज को डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने फहराया था। तीसरी बार में प्रस्तावित हुए इस नए झंडे में पांच लाल और चार हरे रंग की पट्टियां थीं। झंडे के अंत की ओर काले रंग में त्रिकोणनुमा आकृति बनी थी। वहीं, बाएं तरफ के कोने में यूनियन जैक भी था। जबकि एक चांद और तारे के साथ, इसमें सप्तऋषि को दर्शाते सात तारे भी शामिल किए गए थे।

बापू ने झंडे में किया बदलाव
1921 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में आंध्र प्रदेश के एक व्यक्ति ने महात्मा गांधी को एक झंडा दिया था, यह हरे और लाल रंग का बना हुआ था। गांधीजी को यह पसंद आया और उन्होंने इसमें कुछ बदलाव करवाए। उन्होंने इसमें सफेद रंग की एक पट्टी और जुड़वाई थी। वहीं, देश के विकास को दर्शाने के लिए बीच में चलता हुआ चरखा भी दर्शाया गया। तब कहीं जाकर इसे आजाद भारत के ध्वज के लिए स्वीकार किया गया।

1931 में एक बार फिर से बदला गया झंडा
आजाद भारत की पहचान के लिए प्रस्तावित झंडा 1931 में एक बार फिर से बदला गया। नए प्रस्तावित झंडे में सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में सफेद रंग और आखिर में हरे रंग की पट्टी बनाई गई थी। इसमें बीच की सफेद पट्टी में छोटे आकार में पूरा चरखा भी दर्शाया गया था। सफेद पट्टी में चरखा राष्ट्र की प्रगति का प्रतीक बताया गया। इस नए झंडे को इंडियन नेशनल कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर अपनाया था।

भारत का नया राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया गया
तमाम प्रयासों के बाद आखिरकार जब 1947 में देश आजाद हुआ तो देश को तिरंगा झंडा मिला। 1931 में बने झंडे को ही एक बदलाव के साथ 22 जुलाई, 1947 में संविधान सभा की बैठक में आजाद भारत का नया राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार किया गया। इस ध्वज में चरखे की जगह मौर्य सम्राट अशोक के धर्म चक्र को गहरे नीले रंग में दिखाया गया है। 24 तीलियों वाले चक्र को विधि का चक्र भी कहते हैं। इस ध्वज को पिंगली वैंकेया ने तैयार किया था। इसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे हरे रंग की पट्टी है। तीनों समानुपात में है। इसकी लंबाई-चौड़ाई दो गुणा तीन है।

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