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Azadi ka Amrit Mahotsav : मरी नहीं जिंदा है दूसरा ’जलियां वाला बाग’ की गवाह ‘इमली’ जिस पर एक साथ 52 क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी

फतेहपुर। आज़ादी के 75वें ’अमृत महोत्सव’ को लेकर पूरे देश में जश्न का माहौल है। भारतवासी इस बार 15 अगस्त के दिन घर-घर तिरंगा फहराएंगे। पर इस खास मौके पर हम आपको ऐसे क्रांतिकारियों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने भारत को अंग्रेजो से आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते अपनी शहादत दे दी। इन्हीं क्रांतिबारियों में से एक जोधा सिंह अटैया थे। जिन्होंने 1856 की क्रांति का बिगुल फतेहपुर की धरती से फूंका। अंग्रेजों पर कहर बन कर टूटे। खजाना लूटा, पुलिस अफसरों को मौत के घाट उतारा। पर एक उनके ही साथी ने धोखा दे दिया। अंग्रेज फौज ने जोधा सिंह अटैया को उनके 51 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया। खजुहा कस्बे से दो किमी की दूरी पर स्थित इमली के पेड पर 28 अप्रैल 1858 को महान क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया समेत उनके सभी साथियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया। वह इमली का पेड आज भी मौजूद है और अंग्रेजों की क्रूरता की गवाही दे रही है।

तात्या टोपे से सीखा गुरिल्ला युद्ध
10 मई 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने क्रांति का शंखनाद किया तो उसकी गूंज पूरे भारत में सुनाई दी। नानाराव पेशवा व उनके सैनिकों ने कानपुर से अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। जिसके बाद ये आग आसपास के जिलों तक पहुंच गई। 10 जून 1857 को फतेहपुर के क्रांतिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए। इनका नेतृत्व जोधासिंह अटैया ने किया। क्रांतिकारी जोधासिंह ने अवध एवं बुंदेलखंड के क्रांतिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी और कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया। जोधा सिंह अटैया व उनके साथियों को तात्या टोपे ने गुरिल्ला वार की कला सिखाई।

किसानों की लगान माफ करवाई
महान क्रांतिकारी जोधासिंह ने अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंगरेज दारोगा और सिपाही को जिंदा जला दिया। रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर तबाही मचा दी। कर्नल पावेल को मौत के घाट उतार दिया। 9 दिसंबर 1857 को जहानाबाद तहसील को घेर कर खजाना लूट लिया। इसमें दो दर्जन पुलिस वाले मारे गए। तहसीलदार को अगवा कर फिरौती में सभी किसानों का लगान माफ करवा लिया। अप्रैल 1858 को अंगरेज सेना ने जोधा सिंह और उनके साथियों को घेर लिया। वह 51 साथियों सहित बंदी बना लिए गए। 28 अप्रैल 1858 की शाम खजुहा में इमली के पेड़ से लटकाकर सभी को फांसी दे दी गई। खौफ इतना फैला कि दो महीने तक कोई शव उतारने ही नहीं आया। बाद में ठाकुर महाराज सिंह ने शव उतरवाए। शिवराजपुर गंगातट पर सभी का अंतिम संस्कार किया।

इमली के पेड़ के नीचे 52 छोटे स्तंभ
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की नाम के दम कर देने वाले जोधा सिंह का खजुहा में स्मारक बना है। यहां उनकी प्रतिमा के साथ शहीद स्तंभ भी है। इमली के पेड़ के नीचे 52 छोटे स्तंभ हैं, जो बताते हैं कि यहीं जोधा सिंह और उनके साथियों ने भारत मां की आजादी के लिए कुर्बानी दी थी। इस स्थान को लोग दूसरा जलियां वाला बाग कहते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यहां भी अंगरेजों ने फांसी के नाम पर सामूहिक नरसंहार ही तो किया था। जलियां वाला बाग की तरह इस स्थान को बड़ा स्मारक नहीं बनाया गया, वरना दुनिया इन महान बलिदानियों को भी जानती। देखरेख का जिम्मा वन विभाग का है।

 

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