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Gujarat Assembly Election 2022 : गुजरात में है आजाद भारत का ऐसा पोलिंग बूथ, जहां सिर्फ एक वोटर जो 500 शेरों के बीच करता वोट, लोकतंत्र के त्योहार की बड़ी दिलचस्प है स्टोरी

अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा की कुल 182 सदस्यीय विधानसभा के लिए पहले चरण में 89 सीटों के लिए 1 दिसंबर की सुबह से मतदान जारी है। जबकि दूसरे चरण में 93 सीटों पर 5 दिसंबर को मतदान होगा। गुजरात में एक ऐसा पोलिंग बूथ है जहां पर सिर्फ एक ही वोटर है। भारत के लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर साल इस एक वोटर के लिए बाकायदा पोलिंग सेंटर बनाया जाता है। पोलिंग बूथ पर 15 चुनाव कर्मियों की टीम इस बार भी पहुंचेगी। बताया जा रहा है कि, ये इलाका जंगल से घिरा होने के चलते अन्य मतदाता नहीं रहते। करीब 500 सौ से ज्यादा शेरों के गढ़ में ये एकलौता मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगा।

शेरों की वजह से अलग पहचान
लोकतंत्र के त्योहार में जहां बड़ी संख्या में लोग बूथ पर लाइन लगाकर वोट डालते हैं, वहीं गुजरात के इस बूथ की अकसर चर्चा होती है। यह पोलिंग बूथ है जूनागढ़ के गिर फॉरेस्ट में। गिर के जंगलों की पहचान देश और दुनिया में शेरों की वजह से रहती है। देश में शेरों की आधिकारिक गणना हर पांच साल पर होती है। 2015 में गिर के जंगल में 523 शेर थे। वहीं 2020 की गणना में शेर-शेरनियों की तादाद 674 तक पहुंच गई। वन विभाग का अनुमान है कि गिर वाइल्डलाइफ सैन्चुअरी में अब शेरों की आबादी 700 के आंकड़े को पार कर चुकी है। लेकिन लोकतंत्र के उत्सव में शेरों से इतर गिर का एक पोलिंग बूथ भी चर्चा में रहता है।

2007 में पहली बार डाला था वोट
गिर में 2007 से ही महंत भरतदास बापू नाम के वोटर मतदान करते थे। उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वोट डाला था। नवंबर 2019 में उनका निधन हो गया था। चुनाव आयोग इस बार भी गिर के जंगल में एक मतदाता के लिए पोलिंग बूथ बनवा रहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने चुनाव की तारीखों का ऐलान करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, था कि, हमारे लिए एक-एक वोट का महत्व है। यह चुनाव संस्था की ताकत है। गुजरात के गिर फॉरेस्ट में हम इकलौते वोटर के लिए पोलिंग बूथ बनाएंगे।

प्राचीन मंदिर के पुजारी थे भारतदास बापू
दरअसल भारतदास बापू सोमनाथ जिले के बानेज गांव के एकमात्र वोटर थे। यहां के एक प्राचीन मंदिर के वह पुजारी थे। गिर के जंगल में आने वाले बानेज के गांव में आने की इजाजत किसी को नहीं है। यहां मंदिर में रहने वाले पुजारी के लिए ही अलग पोलिंग बूथ बनाया जाता है। अक्टूबर 2019 में तबीयत खराब होने के बाद उन्हें राजकोट के क्राइस्ट हॉस्पिटल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। जहां एक महीने तक चले इलाज के बाद उनका निधन हो गया था।

महाभारत काल से है मंदिर का इतिहास
बानेज गांव के जिस मंदिर में भरतदास पुजारी थे, उस मंदिर को महाभारत काल का मंदिर माना जाता है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने वहां तीर मारकर जमीन में छेद किया और उसके बाद यहां से पानी निकला था। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। चूंकि यह मंदिर घने जंगल के बीच है, इसलिए यहां पर शाम को सूरज ढलने के साथ ही सारे श्रद्धालुओं को जाना होता है। यहां रुकने की इजाजत किसी को नहीं है।

बूथ कर्मियों को करना पड़ता था वोटर का इंतजार
वन विभाग के भवन में बूथ स्थापित करते समय मतदान अधिकारियों को मोबाइल नेटवर्क न होने जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें चुनाव आयोग के जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार शाम 6 बजे तक रुकना पड़ता है। भरतदास किसी भी समय यहां आकर वोट डालते थे। ऐसे में बूथ कर्मियों को उनका दिनभर इंतजार रहता था। 2007 के बाद से हर चुनाव में भरतदास पुजारी ने वोट डाला। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ’मुझे गर्व है कि मैंने 2007 के बाद से हुए सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान किया है। मैं सभी मतदाताओं से लोकतंत्र के सबसे बड़े त्योहार में भाग लेने का आग्रह करता हूं।

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