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गरीबों के हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते करोड़पति कैसे हो गए माननीय

दिनेश सिंह/गाजियाबाद

लोकतंत्र में कहीं तो कमी रह गई है, जिसे हम सब प्रजातंत्र समझ रहे हैं वह धरातल पर नहीं दिखता है। हां मीडिया समूहों नेताओं की जुबान तो नौकरशाही के विकासोन्मुखी योजनाओं में ही दिखता है । आजादी के 70 साल बाद भी गरीबी रेखा जो कि सरकारी संतुलन का प्रायोजित ग्रुप है उसमें भी मामूली उतार-चढ़ाव देखने को ही मिलता है सांख्यिकी गणितज्ञ के द्वारा जारी डांटा सूचकांक को सरकारी दबाव के बावजूद भी मन मुताबिक नहीं बड़ा पाते। जबकि हकीकत में गरीबों की संख्या में गुणात्मक इजाफा हुआ है। कितने परिवार तो इस कोविड-19 में लोअर मध्यमवर्ग से गरीबी रेखा में आ गयें है ।कारण क्या है । क्यों ऐसा हो रहा है। कुछ बुद्धिजीवियों के अनुसार प्रजातंत्र में जनता के हितों के रक्षक जनप्रतिनिधियों ने सेवा भाव त्यागकर रक्त पीपासु परजीवी हो गए हैं, उनमें धन की लालसा ज्यादा है। वनस्पति जनता को मिलने वाली सुविधाओं के हर योजनाओं में विधायकों ,सांसदों की भागीदारी से योजनाएं अपनी गुणवत्ता एवं अंतिम शिखर बिंदु तक नहीं पहुंच पाती।

पहले किसी विकास योजना में नौकरशाही का आंशिक कमीशन तय होता था। लेकिन जनप्रतिनिधि अब तय करते हैं कि योजना ,किसे दी जाए ,ओपन टेंडर मात्र छलावा एवं दिखावा होता है एक-एक विधायक मंत्रियों के अपने ठेकेदार होते हैं जो तय करते हैं किसे कौन सा कार्य दिया जाएगा, जनता की हालत वही है जैसे एक डिब्बे पर स्पष्ट लिखा होता है कि कृपया हमें प्रयोग करें । आम आदमी मात्र मतदाता बन के रह गया है। जनता से किसी भी योजना में राय नही ली जाती है।राजनैतिक नेता सत्ता धीश होने पर जनता को भूल जाते हैं। जनतंत्र कहीं नहीं दिखता।अब यह है कि माननीय दिन प्रतिदिन अमीर हो रहे हैं। दूसरी तरफ गरीब और गरीब हो रहा है मात्र सस्ते अनाज एवं सरकारी हजारों रुपए की खैरात से गृहस्ती नहीं चलती है। उसके लिए आम आदमी को काम चाहिए, काम के लिए संसाधन चाहिए। तो हम काम के बदले पूरा पारिश्रमिक चाहिए जो शायद सरकार देने में नाकाम रही है।

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