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Mahoba: नवरात्र में महिलाओं की अजब भक्ति, मातारानी को प्रसन्न करने के लिए शरीर पर बोती हैं जौ

सौरभ तिवारी, महोबा

कहते हैं कि आस्था है तो भगवान हैं नहीं तो मूर्ति तो पत्थर है, आस्था से ही लोग अपने शरीर पर नवरात्रि में जौ बोकर नौ दिन गुजार देते हैं और अन्न, जल तक ग्रहण नहीं करते। जी हाँ बुंदेलखंड के महोबा जिले में एक नहीं ऐसी कई महिलाएं हैं जो अपने शरीर पर जौ बोकर मातारानी के ध्यान में नौ दिन लीन रहती हैं।

महोबा जिले के स्योढी गांव की रहने वाली 35 वर्षीय महिला मालती देवी बीते पांच वर्षों से लगातार नवरात्री के अवसर पर अपने शरीर पर आसमानी माता के चबूतरे पर लेटकर जौ बोती चली आ रही हैं और यह नौ दिनों तक अन्न, जल त्याग कर एक ही मुद्रा में लेट कर माता के ध्यान में लीन हो जाती हैं। इसी प्रकार खिरिया गांव में भी एक महिला अपने शरीर पर जौ बोकर नौ दिनों तक माता के ध्यान में लीन रहती हैं। जौ बोने वाली महिलाएं कहती हैं कि माता आसमानी के लिए 13 दिनों तक व्रत रखती हैं और यह पूरा शरीर उन्हें निछावर करती हैं। माँ आसमानी की प्रेरणा से यह जौ बोती हैं और पांच वर्षों से बोते चली आ रही हैं और हमारी श्रद्धा का मोल नही है सभी लोगों की खुशहाली के लिए माता से प्रार्थना करती हैं। गांव की महिलाएं कहती हैं कि मालती आसमानी देवी के नाम से अपने शरीर पर अन्न, जल त्यागकर जौ बोती हैं और भगवान में लीन रहती हैं इनका पति एक किसान है और इनको ग्रामीण मना करते हैं लेकिन यह नही मानती और हर वर्ष जौ बोती हैं। माता आसमानी देवी के चबूतरे पर दरवार भी लगता है उसी जगह यह लेटकर जौ बोती है। वहीं मंदिर के पुजारी का कहना है कि मालती देवी अन्न पानी छोड़कर पांच वर्ष से अपने शरीर पर जौ बोती चली आ रही है। यह आसमानी माता का मंदिर और चबूतरा है जहां पर माता का दरबार भी लगता है।

आजादी के अमृत महोत्सव पर विजयदशमी का विशेष महत्व है यही वो दिन है जब 1909 को इंडिया हाउस में हिंद स्वराज का विचार महात्मा गांधी के मन में उपजा था बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने सन 1956 में विजय दशमी के दिन ही नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धर्म शिक्षा ली थी यह पर्व शोषणकारी सभ्यता के विरुद्ध समता ममता और पोषण कारी दृष्टि से युक्त सभ्यता का पर्व है विजय का तात्पर्य किसी प्राणी को दास बनाना नहीं बल्कि पासबुक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना है यही उचित ही है जब 9 दिन तक चले कलिंग युद्ध के नरसंहार से व्यथित चंड अशोक ने धम्म दीक्षा ली थी दशहरा पर्व 10 प्रकार के पापों काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर अहंकार आलस हिंसा और चोरी के प्रत्याशी सब प्रेरणा प्रदान करता है भारतीय इतिहास में ऐसा पर्व है जो असलियत में हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति का प्रतीक बन चुका है विजय का हिंदी अर्थ है स्वर धर्म और स्वदेश की रक्षा ना कि दूसरा युद्ध कर दूसरों की भूमि और स्वस्थ का अपहरण विजय का सभ्यता का अर्थ है सर्वोदय के भाव से के शत्रुओं का दमन

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