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‘हथेली’ के बाद जिनपिंग का फाइव फिंगर्स पर कब्जे का प्लान हुआ लीक, ड्रैगन को पटखनी देने के लिए भारत के स्विट्जरलैंड इलाके में इंडियन आर्मी के साथ ही वायू सेना भी हुई एक्टिव

नई दिल्ली। चीन की पीएलए ने 9 दिसंबर को अरुणाचल के तवांग में एलएसी के अंदर घुसने का प्रयास किया। जिसका इंडियन आर्मी ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए ड्रैगन के करीब 300 सैनिकों को एलएसी से खदेड़ दिया। हाथा-पाई में दोनों तरफ के सैनिक घायल भी हुए हैं। दुनिया को अपनी अंगुलियों पर नाचाने की सोच रखने वाला चालबाज चीन जब भी भारत की तरफ आंख तरेरता है तो उसे मुंह की ही खानी पड़ती है। चीन की सोच हमेशा कब्जाधारी की रही है। वो अपने पड़ोसियों की जमीनों को हथियाना चाहता है। 1940 में मोओ ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। माओ तिब्बत को हथेली समझता था और तभी उसने फाइफ फिंगर प्लॉन तैयार किया था। प्लान में चीन की विस्तारवादी सोच पर अमल करने के लिए रणनीति बनाई गई थी।

माओ ने देखा था कब्जे का सपना
तिब्बत पर अवैध कब्जे के बाद से ही चीन ने अपने ’फाइव फिंगर्स’ प्लान को एक्टिव किया हुआ है। इसके तहत चीन सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, भूटान, नेपाल और लद्दाख को किसी भी कीमत पर कब्जाना चाहता है। ऐसे में गलवान के बाद तवांग में पीएलए की गुस्ताखी ने ये साबित भी कर दिया है। दरअसल माओ ने इन पांचों जगहों को अपने हाथ की पांच अंगुलियां और तिब्बत को हथेली बताया था। 1940 में दशक में लाल क्रांति के बाद चीन में माओ सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे थे। माओ का ही मानना था कि तिब्बत और उससे जुड़े इलाके चीनी साम्राज्य का हिस्सा रहे हैं, इसलिए इन इलाकों को किसी भी कीमत पर हासिल करना है।

हथेली को बताया तिब्बत
विवादित नीति में तिब्बत को 5 फिंगर पॉलिसी की हथेली बताया था और इसी हथेली पर 1959 से चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। इस नीति की आड़ में चीन पांचों जगहों पर कब्जा कर हिमालय में एकक्षत्र राज कायम करना चाहता है। इस कारण चीन विस्तारवादी एजेंडे के तहत ‘फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत स्ट्रैटजी’ में पड़ोसी देशों पर कब्जा करने की साजिश पर विशेष फोकस करता रहा है। चीन पैसे के बल पर श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के अंदर दाखिल हो चुका है। अब ड्रैगन की नजर भारत की एलएसी पर है। इसी के चलते चीन 2020 में गलवान के अंदर दाखिल होने का प्रयाय किया, लेकिन भारतीय सेना के पराक्रम के चलते उसे मुंह की खानी पड़ी।

क्या है ‘फाइव फिंगर्स स्ट्रैटजी

आपको बता दें कि पांच अंगुलियों में सिक्किम का भारत में 1975 में विलय हो गया था। तब चीन ने जमकर इसका विरोध किया था, लेकिन उसकी एक नहीं चली। चीन दूसरी अंगुली अरुणाचल प्रदेश को बताता है। साल 1962 में जब भारत-चीन का युद्ध हुआ तो चीन की सेना काफी अंदर तक घुस आईं लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं हो पाए। चीन की कब्जाधारी नीति में तीसरी अंगुली नेपाल को बताया गया है। चौथी अंगुली भूटान पर भी चीन कब्जे की मंशा पाले हुए है। पांचवी फिंगर जिस पर चीन की सबसे ज्यादा निगाह रहती, वो लद्दाख है, लेकिन चीन कितनी भी साजिशें रचे, उसका ये सपना अधूरा ही रहने वाला है।

तवांग पर कब्जे का सपना
9 दिसंबर को चीनी सैनिक, भारतीय सेना से उलझ गए थे। तवांग के पास यांगत्से में यह घटना हुई है। यांगत्से, 17 हजार फीट की ऊंचाई पर तवांग का वह हिस्सा जिस पर सन् 1962 की जंग के बाद से ही चीन की बुरी नजर है। वह युद्ध के समय से ही तवांग के यांगत्से पर कब्जे के सपने देख रहा है। सेना के सूत्रों की मानें तो यांगत्से को पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) की हमेशा से निशाना बनाने की फिराक में रहती थी। आखिर तवांग और यांगत्से में ऐसा क्या है जो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस पर कब्जे का सपना पाले हुए हैं।

इसलिए करना चाहता है कब्जा
अब बात करते हैं यांगत्से की, यह जगह तवांग से 35 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व दिशा में हैं। पिछले साल नवंबर में भी यहीं पर चीनी सैनिकों के साथ झड़प होने की खबरें आई थीं। यांगत्से, मार्च के महीने तक बर्फ से ढंका रहता है। यह जगह भारतीय सेना के लिए रणनीतिक अहमियत रखती है। सूत्रों के मुताबिक भारत और चीन के तीन से साढ़े तीन हजार सैनिक इस इलाके के आसपास तैनात रहते हैं। साथ ही ड्रोन से भी इस पर नजर रखी जाती है। दोनों तरफ से सड़क का अच्छा-खासा नेटवर्क है और वास्तवकि नियंत्रण रेखा (एलएसी) के करीब सैनिक गश्त करते रहते हैं। यांगत्से वह जगह है जहां से चीन पूरे तिब्बत पर नजर रख सकता है। साथ ही उसे एलएसी की जासूसी करने का भी मौका मिल जाएगा।

पहले यहीं पहुंचे दलाई लामा
10,000 फीट की ऊंचाई पर बसा तवांग वही जगह है जहां पर तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा सबसे पहले पहुंचे थे। अप्रैल 2017 में जब दलाई लामा कई साल के बाद तवांग पहुंचे थे तो चीन का खून खौल उठा था। दलाई लामा को चीन एक अलगाववादी नेता मानता है। पिछले साल जुलाई में जिनपिंग ने चुपचाप तवांग के करीब स्थिति न्यिंगची का दौरा किया था। वह चीन के पहले नेता थे जो यहां पर पहुंचे थे। न्यिंगची, तिब्बत का शहर और अरुणाचल प्रदेश से सटा है। इसे तिब्बत का स्विट्जरलैंड तक कहते हैं। तवांग पर कब्जा यानी पूरे पूर्वी हिस्से पर कब्जा, चीन इस बात को अच्छे से जानता है और इसलिए ही वह अक्सर तवांग पर आंख दिखाने की कोशिशें करता रहता है।

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