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बेपनाह मोहब्बत करते थे हिन्दुस्तानी पर अड़ गए पाकिस्तानी, टॉस के जरिए जीती ठाकुर गोविंद सिंह ने राष्ट्रपति की बिना इंजन वाली गाड़ी

दिल्ली। अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भारत से अलग होकर पाकिस्तान नाम का एक नया मुल्क विश्व के नक्शे में आया था। दोनों देशों के बीच हर चीज का बंटवारा हो चुका था, लेकिन बात एक बग्घी पर अटक गई। हिन्दुस्तान हर कीमत पर बग्घी अपने पास रखना चाहता था तो पाकिस्तानी भी इसे पाने के लिए अड़ गए। आखिरकार इसका फैसला सिक्का उछालकर हुआ। भारत को जीत मिली और सोने की परत लगी ये बग्घी आज भी हमारे राष्ट्रपति की शोभा बढ़ा रही है।

दोनों देशों ने ठोका
1947 में आजादी के बाद गवर्नर जनरल के बॉडीगार्ड, जिन्हें अब राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड के रूप में जाना जाता है, को 2ः1 के अनुपात में भारत-पाकिस्तान के बीच बांट दिया गया। जब वायसराय की बग्घी की बारी आई तो दोनों देश इस पर अपना दावा ठोकने लगे। राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रेजिमेंट के पहले कमांडडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी सेना के साहबजादा याकूब खान के बीच बग्घी को लेकर टॉस हुआ। इसमें जीत भारत की हुई और इस तरह ये बग्घी हमें मिल गई।

पहली बार सवार हुए थे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद
1950 में देश के पहले गणतंत्र दिवस समारोह में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने राजपथ पर हुई गणतंत्र दिवस परेड में इसी बग्घी में बैठकर हिस्सा लिया था। शुरुआती सालों में भारत के राष्ट्रपति सभी सेरेमनी में इसी बग्घी से जाते थे और साथ ही 330 एकड़ में फैसले राष्ट्रपति भवन के आसपास भी इसी से चलते थे। राष्ट्रपति की ओर से इस प्रसिद्ध बग्घी का इस्तेमाल 1984 तक लगातार होता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से इस बग्घी का इस्तेमाल रोक दिया गया था।

मिक्स ब्रीड के घोड़ों का इस्तेमाल
पहला गणतंत्र दिवस समारोह नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में हुआ था। इसका नाम अब मेजर ध्यान चंद्र स्टेडियम है। यह बग्घी करीब 35 साल पुरानी थी तब 6 ऑस्ट्रेलियाई घोड़े इसे खींच रहे थे। इस बग्घी में इस्तेमाल होने वाले घोड़े भी विशेष नस्ल के होते हैं। इसे खींचने के लिए भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई मिक्स ब्रीड के घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल भारतीय नस्ल के घोड़ों की ऊंचाई ज्यादा होती है जबकि यह मिक्स ब्रीड इस बग्घी की ऊंचाई पर एकदम फिट बैठती है। यही कारण है कि इसे खींचने के लिए इन्हीं नस्ल के घोड़ों का इस्तेमाल होता है।

प्रणब मुखर्जी ने फिर शुरू की परम्परा
संसद में बजट सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पारंपरिक बग्घी पर सवार होकर संसद के दोनों सदनों को संबोधित करने के लिए आए थे। राष्ट्रपति ने 2014 में बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी से बग्घी पर बैठने की दोबारा परंपरा शुरू की थी। करीब 20 वर्षों से सुरक्षा कारणों के चलते इस बग्घी का यूज नहीं हो रहा था। इसकी जगह राष्ट्रपति लिमोजिन कार से सार्वजनिक समारोहों में आते थे। प्रणब से पहले 2002 से 2007 तक देश के 11वें राष्ट्रपति रहे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी कभी-कभार राष्ट्रपति भवन में घूमने के लिए बग्घी का इस्तेमाल करते थे।

राष्ट्रपति कोविंद भी हुए सवार
25 जुलाई 2017 के दिन शानदार कार के बजाय रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने राष्ट्रपति भवन से संसद तक का सफर ऐतिहासिक बग्घी में तय किया था। उस समय निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बग्घी में बाएं बैठे थे जबकि नए राष्ट्रपति कोविंद दाईं ओर बैठे थे। कोविंद के शपथ लेने के बाद बग्घी में दोनों की जगह बदल गई और लौटते समय प्रणब दाईं और कोविंद बाईं ओर बैठे थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अक्सर बग्घी पर सवार होकर जाते हैं।

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