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शौर्य और पराक्रम का प्रतीक के साथ ही दुश्मनों के लिए काल था इंडियन आर्मी का ये ‘बहादुर योद्धा’, ताबड़तोड़ फायरिंग के बीच आतंकियों का कुछ इस तरह से करता था मुकाबला

नई दिल्ली। 2 साल की छोटी सी उम्र में दुश्मनों के लिए काल और टेरर ऑपरेशन के लिए वह मास्टर था। उसने कश्मीर में कई टेरर ऑपरेशन को सफलता पूर्वक अंजाम दिया था। इंडियन आर्मी ने इस बेजुबान डॉगी को द ग्रेट सोल्जर जूम का नाम दिया था। 9 अक्टूबर को सेना को खबर मिली की अनंतनाग में कुछ आतंकी एक घर में छिपे हुए हैं। सेना का ऑपरेशन अनंतनाग शुरू हो गया। घर पर छिपे आतंकियों की भनक जूम को लगी तो वह अंदर दाखिल हो गया। इस दौरान अमन के दुश्मनों ने बेजुबान को गोली मार दी। दो गोली लगने के बाद भी वह लड़ता रहा। सेना के जवानों ने तभी आतंकियों की लोकेशन को ट्रेस कर उन्हें ढेर कर दिया। लेकिन इस एनकाउंटर में उनका जांबाज योद्धा गंभीर रूप से घायल हो गया। 72 घंटे चले इलाज के बाद जूम शहीद हो गया। जूम को अंतिम विदाई पूरे सम्मान के साथ दी गई। इस मौके पर सेना के लेफ्टनेंट जनरल भी मौजूद रहे। साथ जूम के साथी डॉग्स ने भी दो पैरों में खड़े होकर अपने जाबांज साथी को आखिरी विदाई दी।

अनंतनाग के तांगपॉ में मिलिट्री डॉग जूम ने बहुत ही सराहनीय भूमिका निभाई थी। इस दौरान उसने न सिर्फ आतंकियों की लोकेशन की पहचान में मदद की, बल्कि एक आतंकी को खत्म करवाने में भी अहम भूमिका निभाई। इस दौरान यह बहादुर मिलिट्री डॉगी को दो गोलियां लगी थीं। जख्मी होने के बावजूद जूम ने अन्य छुपे हुए आतंकियों के ठिकानों की भी पहचान की। आर्मी के पीआरओ ने बताया कि जूम की सक्रियता के चलते सेना दो लश्कर आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब रही।

मिशन खत्म होने के बाद जूम वहां से लौट आया, हालांकि बहुत ज्यादा खून बह जाने के चलते वह बेहोश हो गया था। उधर जूम को गंभीर हालत में श्रीनगर के आर्मी वेटनरी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसने अंतिम सांस ली। गुरुवार को पूर्वाह्न 11 बजकर 50 मिनट पर उसने प्राण त्याग दिए। अपने दो साल के सेवाकाल में ही जूम ने कई आतंकी मिशन में अपना अमूल्य योगदान दिया था। इस दौरान उसने अपने साहस और ऊर्जा से अपनी अलग पहचान बनाई थी।

इंडियन आर्मी ने शुक्रवार को अपने एक वीर योद्धा को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। यह योद्धा भारतीय सेना की डॉग यूनिट का सदस्य जूम था। गुरुवार को अनंतनाग जिले में हुए एनकाउंटर में जूम घायल हो गया था। इसके बाद उसका इलाज चला, लेकिन जान नहीं बचाई जा सकी। इस बहादुर डॉग को श्रीनगर के बादामी बाग स्थित कैंटोनमेंट स्थित चिनार वॉर मेमोरियल में अंतिम विदाई दी गई। इस मौके पर सेना के कई अफसर मौजूद थे। इसमें चिनार कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एडीएस औजला और तमाम अन्य अफसर मौजूद रहे।

गौरतलब है कि इस साल जुलाई में सेना के एक अन्य कुत्ते ‘एक्सल’ ने कश्मीर घाटी में एक आतंकवाद विरोधी अभियान में अपनी जान गंवा दी थी। उसे स्वतंत्रता दिवस पर मरणोपरांत वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 30 जुलाई को एक ऑपरेशन के दौरान एक आतंकी को 7.62 एमएम की एके-47 राइफल पकड़े देख एक्सल ने कूदकर उस पर हमला कर दिया। आतंकवादियों ने बहादुर कुत्ते को गोली मार दी। घायल होने के बावजूद उसने फिर से हमला करने की कोशिश की. लेकिन बहुत ज्यादा खून बहने के कारण नीचे गिर गया और उसकी मौत हो गई।

बता दें, साल 1959 में भारतीय सेना में सहायता के लिए पहली बार खोजी कुत्तों (आर्मी डॉग्स) को शामिल किया गया था। तब से लेकर अब तक विभिन्न प्रकार की नस्लों के कुत्ते भारतीय सेना में शामिल हो चुके हैं। इन खोजी कुत्तों को भारतीय सेना बड़ी शिद्द्त के साथ ट्रेंड करती है। ये खोजी कुत्ते जमीन में छुपाए गए विस्फोटक पदार्थों को सूंघकर पता लगा लेते हैं।ये संदिग्ध व्यक्ति को सूंघकर उसकी शिनाख्त आसानी से कर लेते हैं। ये कुत्ते हिंसक भीड़ का पीछा करने और फरार आतंकवादियों का पता लगाने में भी बखूबी माहिर होते हैं। बहुत सारे कुत्तों को अशांत क्षेत्रों में तैनात किया जाता हैं। इन कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसान की सूंघने की क्षमता से 50 गुना अधिक होती है। प्रशिक्षण से लेकर सेना में शामिल होने तक भारत की सरकार एक बड़ी धनराशि इन खोजी कुत्तों पर खर्च करती हैं।

लैब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन मेलिनोइस, ग्रेटर स्विस माउंटेन डॉग और बुलडॉग वाली कुत्तों की नस्लों को ज्यादतर भारतीय सेना में शामिल किया जाता है। क्योंकि इन नस्लों में सीखने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है। सेना, इन कुत्तों को इनके बेहतरीन कार्यों के लिए समय-समय पर पुरस्कारों से सम्मानित भी करती रहती है। कहा जाता है कि वियतनाम-अमेरिका युद्ध में अमेरिकी सेना ने करीब चार हज़ार कुत्तों का प्रयोग किया था। इन कुत्तों में से ज्यादातर लैब्राडोर ही थे। लैब्राडोर कुत्तों ने घायल अमेरिकी सैनिकों और पानी के नीचे छिपे दुश्मन सैनिकों को खोज निकालने में अमेरिकी सेना की बहुत मदद की थी।

 

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