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इस क्रांतिकारी ने कानपुर में भगत सिंह की चंद्रशेखर आजाद से करवाई थी मुलाकात, ‘पंडित जी’ ने शहीद-ए-आजम को ओरछा के जंगलों में बंदूक चलाने की दी ट्रेनिंग

कानपुर। देश 15 अगस्त को आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। जिसको लेकर पूरे देश में जश्न का महौल है। घर-घर तिरंगे अभी से फहराए जा रहे हैं तो तिरंगा यात्रा निकाल कर लोग क्रांतिकारियों के बलिदान के बारे में युवा पीढ़ा को रूबरू करा रहे हैं। आजादी के 75वें अमृत उत्सव पर हम आपको शहीद-ए-आजम  भगत सिंह और पंडित चंद्रशेखर आजाद के बारे में बताने जा रहा हैं। अंग्रेजों के खिलाफ जंग-ए-आजादी का बिगुल फुंकने के बाद भगत सिंह कानपुर आए थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र ’प्रताप’ में शहीद-ए-आजम ने नाम बदलकर काम किया। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह की मुलकात महान क्रांतिकारी पंडित चंद्रशेखर आजाद से करवाई थी। यहीं पर काकोरी कांड की महत्त्वपूर्ण योजना बनी थी। इतना ही नहीं झांसी के ओरछा स्थित जंगल में भगत सिंह और उनके साथियों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग पंडित जी ने दी थी।

कानपुर क्रांतिकारियों का रहा गढ़
सन 1857 से लेकर 1947 तक कानपुर क्रांतिकारियों का एक महत्वपूर्ण गढ़ बना रहा। यहां देश भर के क्रांतिकारियों ने शरण ली। यहां अंग्रेजों के खिलाफ योजनाएं बनाई गईं और क्रांति की मशाल को दिन पर दिन मजबूत किया गया। फीलखाना में गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र ‘प्रताप’ का दफ्तर हुआ करता था। गणेश शंकर अपनी पत्रकारिता के जरिये अंग्रेजी शासन को लगातार चुनौती दे रहे थे। क्रांतिकारियों के लिए प्रताप प्रेस एक महत्वपूर्ण ठिकाना हुआ करता था। यहां वे अपनी योजनाएं बनाते थे और छिप के रहते भी थे। खुद भगत सिंह ने बलवंत सिंह के नाम से प्रताप प्रेस में रहकर गणेश शंकर से पत्रकारिता सीखी थी। भगत िंसह के कहने पर विद्यार्थी जी ने पंडित चंद्रशेखर आजाद से उनकी मुलाकात करवाई और दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के पैरों के तले से जमीन खिसका दी।

बंदेलखंड की धरती से भी आजादी का संग्राम
अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का बुंदेलखंड और झांसी की धरती से भी गहरा नाता रहा है। यहां उन्होंने अपने क्रांतिकारी जीवन के छह साल बिताए हैं। ओरछा स्थित सातार में पंडित जी एक कुटिया में पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से रहते थे। सातार में उनकी कुटी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गई थी। अधिकांश गुप्त योजनाएं इसी कुटी में बनती थीं। यहीं रहकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबना बुना था। ओरछा के जंगलों में उन्होंने दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण और बच्चों को अध्यापन कराया। इसके साथ ही यहां उन्होंने अपने साथियों के साथ निशानेबाजी भी की।

बम, बंदूक बनाने और चलाने की कला से किया दक्ष
स्थानीय लोग बताते हैं कि, चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और उनके साथियों को बुंदेलखंड में गोली चलाना सिखाया था। चंद्रशेखर आजाद को खाने में कढ़ी बहुत पसंद थी। स्थानीय लोग बताते हैं कि, भगत सिंह के साथ वह कढ़ी और चावल खाया करते थे। आजाद जंगल में जाकर बम, गोली, बनाने के साथ औजारों के चलाने की ट्रेनिंग भी दिया करते थे। झांसी निवासी रामदास तिवारी बताते हैं कि भगत सिंह कई माह रूके और अंग्रेजों के खिलाफ बंदेलों को हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया। रामदास बताते हैं कि, चंद्रशेखर आजाद की माता जी भी कई साल यहीं रूकी थीं।

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