ब्रेकिंग
नवाबगंज पुलिस ने नहीं सुनी शिकायत तो पिता ने बेटे की खुद शुरू की पड़ताल, सीसीटीवी फुटेज देकर थाना प्रभारी से ‘घर के चिराग’ को बचाने की लगाई फरियाद, पर लाश मिली ‘सरकार’गोकश और पुलिस के बीच फायरिंग की तड़तड़ाहट से थर्राया घाटमपुर, गोली लगने से इंस्पेक्टर समेत दो घायल’अग्निपरीक्षा’ में पास हुए एकनाथ शिंदे, महाराष्ट्र की नवनियुक्त सरकार ने जीता विश्वास मत, जानें कांग्रेस-एनसीपी के आठ विधायक वोटिंग से क्यों रहे दूरदोस्ती पर भारी पड़ गया ‘नफरत’ वाला खंजर’, गला काटने के बाद अंतिम संस्कार में शामिल हुआ ‘जल्लाद’…हैलो मैं अल कायदा का सदस्य बोल रहा हूं, ‘महामंडलेश्वर आपके साथ गृहमंत्री अमित शाह और सीएम योगी को बम से उड़ा दूंगा’राजीव नगर में अतिक्रमण हटाने पहुंचे नगर निगम के दस्ते पर हमला, एसपी समेत कई पुलिसकर्मी घायल, 17 जेसीबी के साथ दो हजार जवानों ने 70 घरों को ढहायाSpecial story on anniversary of bikru case – ऐसा था विकास दुबे कानपुर वाला, 2 जूलाई को बहाया ‘खाकी के खून का दरिया’उदयपुर केस में सामने आई सनसनीखेज साजिश, दरिंदों ने 2013 में खरीदी ‘2611’ वाली तारीखISIS स्टाइल में उदयपुर के बाद अमरावती में हत्या, दरिंदों ने चाकू से दवा कारोबारी का गला काटाउदयपुर के कन्हैया हत्याकांड में शामिल थे 5 आतंकी, अपने साथियों को बचाने के लिए दुकान के पास खड़े थे दो आतंकी

ऑटो रिक्शा चलाने और रिवॉल्वर-पिस्टल रखने वाले इस नेता ने ठाकरे को दी चुनौती, महाराष्ट्र की महा विकास आघाडी सरकार गिरने की शुरू हुई उल्टी गिनती

मुम्बई। महाराष्ट्र में महा विकास आघाडी सरकार के सामने सियासी संकट खड़ा है। शिवसेना के कद्दावर नेता व कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री उध्दव ठाकरे को सीधी टक्कर देते हुए पार्टी से बगावत कर दी है। शिंदे का दावा है कि उनके पास 45 से ज्यादा विधायक होटल में मौजूद हैं। शिवसेना के ‘संकटमोचक’ एकनाथ शिंदे ‘सरकार’ से क्यों नाराज हैं। उनका और सेना व ठाकरे परिवार से कैसे रिश्ते रहे हैं और एक ऑटो रिक्शा चलाने वाला नेता महाराष्ट्र सरकार पर क्यों भरी पड़ रहा है। इसकी पूरी डिटेल से हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं।

ऑटो रिक्शा चलाया
एकनाथ शिंदे का जन्म 9 फरवरी 1964 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। सतारा के पहाड़ी जवाली तालुका के पास उनका परिवार रहता था। उन्होंने ठाणे में मंगला हाई स्कूल और जूनियर कॉलेज से पढ़ाई की। इसके बाद आजीविका चलाने के लिए वह ऑटो रिक्शा चलाने लगे। काफी समय ठाणे में रहने के बाद एकनाथ शिंदे यहां के वागले एस्टेट इलाके के निवासी हो गए। मंबई से सटे ठाणे के लिए एकनाथ शिंदे बड़ा नाम है। ऐसा कहा जाता है कि ठाणे में उनकी तुती बोलती है. वे लोकसभा या निकाय चुनाव में जिसे मैदान में उतारते हैं, उसकी जीत पक्की हो जाती है। इनका उम्मीदवार ही चुनाव जीतता है।

शिंदे का सियासी कॅरियर
एकनाथ शिंदे 1997 में ठाणे महानगर पालिका से पार्षद चुने गए और 2001 में नगर निगम सदन में विपक्ष के नेता बने। इसके बाद दोबारा साल 2002 में दूसरी बार निगम पार्षद बने। इसके अलावा तीन साल तक पॉवरफुल स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रहे। दो साल बाद ही शिंदे विधायक बन गए। ठाणे इलाके में शिवसेना के दिग्गज नेता आनंद दीघे का साल 2000 में उनके निधन हो गया। इसके बाद ही बाद ठाणे में एकनाथ शिंदे आगे बढ़े और इनका कद पार्टी में बढ़ता चला गया। मातोश्री के सबसे करीबी नेताओं की लिस्ट में एकनाथ शिंदे का नाम सबसे पहले लिया जाता था। एकनाथ शिंदे साल 2004 में पहली बार विधायक निर्वाचित हुए थे। 2009, 2014 और 2019 में भी विधानसभा सदस्य निर्वाचित हुए।

सीएम की रेस में था एकनाथ शिंदे का नाम
एकनाथ शिंदे की ताकत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2019 में शिवसेना की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी भी नाम सामने आया थौ उद्धव ठाकरे के सीएम पद संभालने को लेकर अटकलें जारी थीं और ऐसे वक्त में एकनाथ शिंदे का नाम सामने आ रहा था। हालांकि, आखिरी वक्त में शरद पवार और सोनिया गांधी के दखन के बाद उद्धव ठाकरे सीएम बनें और शिंदे मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे। महाराष्ट्र की राजनीति के जानकारों की मानें तो आखिरी वक्त में हाथ से कुर्सी छिटक जाने की कसक शिंदे के मन में थी।

बेटा कल्याण से है सांसद
एकनाथ के बेटे श्रीकांत शिंदे भी शिवसेना के ही टिकट पर कल्याण सीट से सांसद हैं। अक्टूबर 2014 से दिसंबर 2014 तक महाराष्ट्र विधानसभा में वे विपक्ष के नेता रहे हैं। 2014 में ही महाराष्ट्र राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। .2019 में इन्हें कैबिनेट मंत्री सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री (महाराष्ट्र सरकार) का पद मिला था।

क्यों हुए बागी
बताया जा रहा है कि गठबंधन की सरकार में शिंदे खुद को ताकतवर महसूस नहीं कर पा रहे थे। कांग्रेस और एनसीपी ही नहीं बल्कि शिवसेना के साथ भी वह असहज महसूस कर रहे थे। पार्टी के अंदर खुद उन्हें अपना कद घटते हुए नजर आ रहा था। इन सब हालात में उनके सब्र ने जवाब दे दिया और उन्होंने बगावत कर ही दी है। जानकारों का कहना है कि इसकी पठकथा तीन माह पहले ही लिख दी गर्द थी। जिसका असर राज्यसभा चुनाव और एमएलएसी चुनाव में देखने को मिला।

Related posts

Leave a Comment

अपना शहर चुने

Top cities