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Mother Day Special 2022: देश की पहली महिला डकैत जिसने बीहड़ में बच्चे को दिया जन्म, डाकू की औलाद को पढ़ा- लिखाकर बनाना चाहती हैं मास्टर

इटावा। पाठा से लेकर चंबल घाटी जहां अपनी खूबसूरती के लिए पहचानी जाती है तो वहीं आजादी के बाद यहां कई दशकों तक डकैतों का राज रहा। मदर्स डे पर हम आपको ऐसी महिला बागी से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसने बीहड़ में बच्चे को जन्म दिया था। हथियार डालने के बाद जेल गई और रिहा होने के बाद डाकू की औलाद को पढ़ा-लिखाकर मास्टर मनाने के मिशन में जुटी है।

डेढ़ दशक तक किया राज
… हां वह कोई नहीं बल्कि पूर्व दस्यू दुंसरी सीमा परिहार है। जो माथे पर काला टीका, सिर पर लाल पट्टी, हाथ में दुनाला बंदूक और बदन पर बागी वर्दी पहनकर जंगल से बाहर निकली तो आमजनों से लेकर लालाजनों तक सब खौफजदा हो जाया करते थे। पुलिसिया महकमे के लिए भी वो ऐसा सिरदर्द बनी कि मोस्ट वॉन्टेड की फेहरिस्त में शामिल होते उसे ज्यादा दिन नहीं लगे और डेढ़ दशक तक 6 लाख एकड़ में फैले इलाके में राज किया।

13 साल की उम्र में हाथ में थामी बंदूक
यूपी के औरैया जिले के बबाइन गांव में सीमा परिहार का जन्म हुआ था। 4 बहन और 2 भाईयों में सीमा अपने माता-पिता की लाड़ली थी। सीमा बताती हैं, जब उनकी उम्र 13 साल की थी, तब बारिश के बीच डाकू लालाराम और कुस्मा नाइन ने उन्हें अगवा कर लिया था। सीमा बताती हैं कि, मैं, डाकुओं के ही बीच रहीं, पलीं-बढ़ी। लालाराम ने हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी। सीमा बताती हैं कि उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हो गए, लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं मारा।

निर्भय गूजर से हुआ प्यार
सीमा बताती हैं कि, 1986 के दशक में गैंग के साथ डाकू निर्भय गूजर को मैं दिल दे बैठी। वह भी मुझसे प्यार करता था। ये बात जब लालाराम को पता चली तो उसने हमारी शादी करा दी। लालाराम ने हमारा कन्यादान किया था। सीमा ने बताया कि कुछ साल बाद मैंने निर्भय को छोड़ दिया और लालराम से दूसरी शादी की। बीहड़ में मैं प्रेग्नेंट हुई और जंगल में लालाराम के बच्चे को जन्म दिया। सीमा बताती हैं कि वह 18 वर्ष तक चंबल में रहीं और 2000 में पुलिस के आगे सरेंडर कर दिया था। सीमा ने बताया कि मजबूरियों के चलते बंदूक उठाई थी। जेल से बाहर आने के बाद समाजसेवा के कार्य में जुट गई। बेटे को मैंने अच्छी परवरिश दी और मेरा बेटा आज 22 वर्ष का हो गया है।

4-4 दिन तक नहीं मिला भोजन
सीमा बताती हैं कि पुलिस मुझे पकड़ने के लिए बीहड़ में उतर चुकी थी। पुलिस से बचने के लिए मैं अपने 10 महीने के बच्चे को लेकर बीहड़ों में यहां से वहां भागी। कई बार 4-4 दिनों तक खाना भी नहीं खाया। इसी तरह 4-5 महीने बीत गए। अंत में मैंने अपने बच्चे के लिए आत्म समर्पण करने का फैसला लिया। सीमा ने बताया कि, 3 साल, 3 महीने तक वह जेल में रही। शुरुआती 6 महीने उसका बेटा भी उसके साथ जेल में रहा था।

बीएससी की परीक्षा कर चुका है पास
जेल से छूटने के मैंने अपने बेटे को अच्छा इंसान बनाने के मिशन में जुट गई। पुलिस के साथ समाज के तानों का मुझे सामना करना पड़ा। सीमा बताती हैं कि बेटे ने कक्षा दसवीं-बारवीं की परीक्षा प्रथम श्रृणी में उत्तीर्ण की। मैथ से बीएससी की परीक्षा पास की। सीमा बताती हैं कि बेटा शिक्षक बन घर-घर शिक्षा की लौ जलाना चाहता है। वह बीएड की परीक्षा की तैयारी कर रहा है। सीमा बताती हैं कि मेरे बेटे का नाम सागर सिंह है। वह आसपास के गरीब बच्चों को निशुल्क में शिक्षित कर रहा है।

उसे भूल पाना नामुमकिन
सीमा परिहार ने कहा कि आज की तारीख में उसकी जिंदगी ठीक-ठाक तरीके से चल रही है, लेकिन चंबल के बीहड़ों में अपनी जिंदगी का जो समय गुजारा है, बीहड़ों में जो दर्द और तकलीफ झेली है, उसे भूल पाना नामुमकिन है। सीमा कहती हैं कि मैंने बिग बॉस से लेकर समाजसेवा में काम किया। लोगों ने भी मुझे अपनाया और अपना प्यार दिया। अब बेटे के भविष्य को संवार रही हूं।

 

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