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अपनी इस ‘प्रियसी’ से बेइंतहा मोहब्बत करते थे मुलायम सिंह यादव, 82 वर्ष पुरानी धरती पुत्र की ये लव स्टोरी इतिहास के पन्नों में हो गई ‘अमर’

इटावा।  जब देश गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के मुहाने पर था…जब देश मैं भारत माता की आजादी के लिए भावनाएं हिचकोले मार रही थी…। उसी वक्त हिंदुस्तान में एक माटी के लाल का जन्म हुआ। बीहड़ की उस मिट्टी पर जहां की तासीर में ही बगावत थी। जहां शासन सत्ता और साहूकारों के दमन के खिलाफ क्रांति की मशाल जल रही थी। उसी मिट्टी में जन्मा एक छोटे कद का बड़ा किरदार। नाम मुलायम इरादे फौलादी हौसला आसमान से भी ऊंचा। वह अब हमारे बीच नहीं रहा। धरती पुत्र के नाम से पहचाने जाने वाले मुलायम सिंह यादव पंचतत्व में विलीन हो गए। पर जाते-जाते वह ऐसा काम कर गए, जिसे सैफई कभी भुला नहीं पाएगी। भविष्य की पीढ़ियां जब इतिहास के पन्ने खंगालेंगी तो नेता जी के किए कार्यों को याद कर खुद को गर्व से महसूस करेगी।

सैफई के अखाड़ों में बड़े-बड़े पहलवानों को धूल चटाने का हुनर सीखा फिर निकल पड़ा बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने। लेकिन मन में कुछ बड़ा करने का इरादा था। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एक ऐसा समाजवाद का आदर्श स्थापित करने का संकल्प था जो शोषित पीड़ित और वंचितों को उनका हक दिला सके। पिछड़ों को समाजवादी व्यवस्था का आधार बना सके। उन्हें वोट तंत्र की ताकत दिला सके। बस वहीं से शुरू हो गई सियासी अखाड़े में चरखा दांव चलाने की शुरुवात और देखते ही देखते मुलायम धरती पुत्र बन गए। उस धरती के बेटे जिसने उन्हें लड़ना सिखाया । सियासत में सफलता भी सैफई से मुलायम के रिश्तो को तोड़ नहीं पाई।

मुलायम के भावनाओं की डोर सफाई से और मजबूत होती चली गई। बचपन में मुलायम का मन हमेशा सालता था की सैफई को कोई जानता क्यों नहीं उसे सफलता के मुकाम पर पहुंचने पर इस टीस को मिटाने की ठान ली। उसके बाद तो सैफई उत्तर प्रदेश क्या देश की सियासत का केंद्र बिंदु बन गया। सैफई विकास के नित नए आयाम गढ़ रहा था जिस सैफई में पैदल चलना मुश्किल था बेलगारिया निकलना मुश्किल थी उस सैफई में समाजवाद हवा में कुलांचे भरने लगा था। हवाई पट्टी में जहाज फर्राटा भरने लगे थे। जिस सैफई के बासिंदे बिना इलाज के दम तोड़ते थे। जहां बुखार के लिए भी बीस किलोमीटर इटावा जाना पड़ता था। उस सैफई में पीजीआई जैसा सुबह का सबसे बड़ा अस्पताल, मेडिकल कॉलेज बनकर तैयार हो गया। जिस सफाई के धूल भरे अखाड़े युवाओं को शारीरिक मजबूती दिया करते थे वहां दो राष्ट्रीय स्तर के खेल के मैदान खड़े करके खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच मुहैया करा दिया गया।

जिस सफाई के बच्चे पढ़ने के लिए करहल और इटावा जाने को मजबूर होते थे उस सैफई में स्कूलों से लेकर कॉलेजों तक की एक बड़ी फेहरिस्त खड़ी हो गई। देखते देखते लकालक सड़कें सैफई की शोभा बढ़ाने लगी। जब पूरे यूपी में अंधकार होता था तब भी सैफई 24 घंटे लाइट से जगमगाता था। मुलायम का हर सुख हर दुख हर खुशी और हर जश्न सैफई में मनाया जाता था। दीपावली हो होली हो या फिर दशहरा पूरा समाजवादी कुनबा या फिर कहें पूरी सरकार सैफई में नजर आती थी और तो और सैफई महोत्सव हर साल इसके वैभव की गवाही देता था।

देश का ऐसा बड़ा अभिनेता ऐसा कलाकार नहीं था जो सफाई ना आया हो कोई ऐसा बड़ा उद्योगपति नहीं था जिसने सैफई की राह न पकड़ी हो। एक माटी का लाल अपनी मिट्टी के लिए भला इससे ज्यादा और क्या कर सकता था। मुलायम सिंह यादव ने सैफई को एक नई पहचान दी। जैसे-जैसे समाजवाद का यह पहरवा सियासत में सफलता के पायदान चल रहा था वैसे वैसे सैफई प्रसिद्धि के नए आयाम गढ़ रहा था। लेकिन शायद नियति को यही मंजूर था माटी का यह लाल 10 अक्टूबर 2022 को चिर निद्रा में सो गया। हमेशा हमेशा के लिए सैफई की धरती के लाल की आखिरी इच्छा थी किया तो उसकी आंख सैफई की उस धरती में ही बंद हो या फिर सबसे पहले उसे अपने घर की मिट्टी नसीब हो और उसे उसी मिट्टी में आखरी अग्नि भी दी जाए।

जाते जाते सैफई का यह ध्रुव तारा सैफई को बुलंदियों के प्रसिद्धि के उस मुकाम पर ले गया जिसकी कल्पना विषय सफाई ने नहीं की होगी। प्रदेश क्या देश की सियासत में भी बहुत कम सिया सदा ऐसे होंगे जिनको ऐसी मौत नसीब हुई होगी जिन्हें ऐसी शानदार विदाई मयस्सर हुई होगी। आखिरी वक्त में हर कोई सिर्फ सैफई की तरफ रुख कर रहा था। सैफई के लाल को एक नजर अपनी आंखों में बसा लेना चाहता था। देश की सियासत का ऐसा कोई धुरंधर नहीं था जो सैफई के इस लाल को आखिरी विदाई देने उसके गांव ना पहुंचा।

आखिर में जिस मिट्टी से जन्म लिया उसी मिट्टी में मिल गया सैफई की माटी का इलाज लेकिन जाते-जाते वह अपने नाम के साथ साथ सैफई को भी अमर बना दिया। अब जब तक लोग मुलायम का नाम लेंगे तब तक सफाई का जिक्र जरूर होगा भला। अटल बिहारी बाजपेई जी की वह कविता इस मौके पर याद आती है मौत की उम्र क्या है, दो पल भी नहीं जिंदगी सिलसिला आजकल कि नहीं मैं जी भर जिया मैं मन से मरू लौट कर आऊंगा कूच से क्यों डरूं। अस्तित्व की ओर से सैफई के इस लाल को शत शत नमन….।

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