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दुमका के बाद पीलीभीत में दुष्कर्म के बाद किशोरी को दरिंदों ने जिंदा फूंका, वेंटीलेटर पर जिंदकी-मौत के बीच की जंग लड़ रही बेटी ने आखिरकार तोड़ा दम, योगी के अफसरों ने फिर हाथरस कांड की दिला दी याद

पीलीभीत। झारखंड के दुमका की तरह उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में दर्दनाक वारदात सामने आई है। यहां दो दरिंदों ने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया और फिर उसे जिंदा जलाकर मौके से फरार हो गए। परिवारवाले उसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर आए। हालम गंभीर होने पर बिटिया को जिला अस्पताल भेजा गया। यहां डॉक्टर्स ने उसे लखनऊ रेफर कर दिया। 12 दिन तक वेंटीलेटर पर जिंदकी-मौत के बीच जंग लड़ते हुए उसकी मौत हो गई। जिससे गांव के लोग गुस्से में आगबबूला हो गए। गांव में तनाव को देखते हुए भारी संख्या में पुलिसबल को तैनात किया गया है।

क्या है पूरा मामला
माधोटांडा क्षेत्र के एक गांव सात िंसतंअर को किशोरी घर पर अकेली थी। इस दौरान गांव के ही दो शोहदे घर में घुस गए और दुष्कर्म किया। उसके बाद दोनों शोहदों ने डीजल डालकर किशोरी को जिंदा जला दिया था। पुलिस मौके पर पहुंची और परिवारवालों की मदद से पीएचसी लेकर गई। यहां से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। तीन दिन तक किशोरी जिला अस्पताल में भर्ती रही फिर हालत गंभीर होने पर उसे लखनऊ रेफर कर दिया गया। जहां घटना के 12 दिन के बाद उसकी मौत हो गई।

आनन-फानन में पुलिस ने दर्ज की एफआईआर
घटना के पहले दिन से पुलिस संगीन वारदात से अंजान रही। दस सितंबर की रात को अफसरों तक मामला पहुंचा तो दौड़-भाग हुई। एसपी के निर्देश पर पिता की तहरीर पर आनन-फानन में हत्या और एससीएसटी एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कर दोनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया। पीलीभीत जिला अस्पताल से लेकर लखनऊ के अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी पर्याप्त इलाज न मिल पाने की बात सामने आई थी। जिस पर परिवार ने भी सवाल खड़े किए थे। अब किशोरी की मौत के बाद परिवार में मातम छा गया है।

बयान लेने में लगाए चार दिन
ये अफसरों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है कि जो जिंदगी मौत के बीच झूल रही किशोरी के बयान लेने में उनको चार दिन लग गए। अब अफसर उस मेमो को लेकर बहानेबाजी करने में लगे हैं, जो जिला अस्पताल से उनको भेजा गया था। तहसीलदार से लेकर एसडीएम तक कोई यह बताने को तैयार नहीं कि आखिर वो मेमो गया कहां। जिला अस्पताल से उसी दिन शाम 6.25 बजे किशोरी के बयान दर्ज कराने के लिए सदर तहसीलदार को मेमो भेजा गया। छानबीन में पता चला कि बाबू ने मेमो रिसीव किया। आठ और नौ को तहसीलदार का लखनऊ जाना था, लेकिन वह सात की शाम को ही निकल गए।

बंद लिफाफे में मेमो यूं ही पड़ा रहा
तहसील में कोई नायब तहसीलदार है नहीं। लिहाजा मेमो एसडीएम के यहां तत्काल भेजा जाना चाहिए था। लेकिन वहां भी नहीं भेजा गया। बंद लिफाफे में मेमो यूं ही पड़ा रहा। उधर, पीड़िता अस्पताल में तड़प रही थी। हद तो यह है कि दस सितंबर को तहसीलदार के लौटने के बाद भी मेमो का कोई जिक्र नहीं हुआ। शाम को जब अस्पताल में पीड़िता ने दुष्कर्म कर जलाने की बात कही तब एसपी अस्पताल पहुंचे। एसडीएम को जानकारी दी गई तब वह अस्पताल बयान लेने दौड़े। मामला उजागर होने पर अब अधिकारी अपने बचाव में लग गए हैं।

एक अधिकारी ने मेमो को अपने पास रख लिया
तहसीलदार कह रहे हैं कि वह छुट्टी पर थे एसडीएम कह रहे है कि उनके पास मेमो आया नहीं। बताया जा रहा है कि मामला उजागर होने के बाद एक अधिकारी ने मेमो को अपने पास रख लिया है। ताकि उस पर मन मुताबिक समय डालकर या कुछ और लिखकर खुद को बचाया जा सके। दुष्कर्म कर अनुसूचित जाति की किशोरी को जलाए जाने का मामला लखनऊ तक पहुंच गया था। लेकिन पूर्व डीएम पुलकित खरे ने भी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि जब सात सितंबर को ही मेमो भेजा गया था तब बयान लेने में चार दिन क्यों लगे। डीएम महज पुलिस की एफआईआर व आरोपियों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट भेजकर शांत हो गए। या यूं कहिए कि उन्होंने अपने अफसरों को बेहद खामोश तरीके बचा लिया। अब शासन तक मामला पहुंचा तो खलबली मची है।

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