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पर्दा प्रथा जायज या नाजायज

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

भारत के शिक्षा पद्धति में पर्दा प्रथा के विरोध स्वरूप कई पाठ्यपुस्तकों में इस कुप्रथा के अध्याय पढ़ाए जाते रहे हैं। इसमें हिंदुओं की संस्कृति पर कटाक्ष एवं रूढ़िवादी संस्कृत का नाम देकर पर्दा प्रथा को बहुत ही खराब दर्शाया जाता था। पाठकों को याद होगा कि बचपन में कई विषयों में पर्दा प्रथा के विरोध में कई अध्याय होते थे और पर्दा प्रथा को अभिशाप के रूप में दिखाया गया एवं महिलाओं पर जुल्म दर्शाना कहा गया। इस कुप्रथा के खिलाफ समय-समय पर कई राजनीतिक पार्टियों ने तीखे बयान दिए और तमाम समाजसेवी संस्थाओं ने इसकी मुखालफत की। प्रश्न यह है यदि पर्दा प्रथा खराब है महिलाओं के अधिकार-स्वाभिमान को बाधित करता है, तो बुर्का प्रथा जायज कैसे हो सकती है क्यों नहीं सरकार इसके खिलाफ जन जागृति अभियान चलाती और इसको पर रोक लगाती है। क्या पर्दा प्रथा मजहब के हिसाब से जायज और नाजायज हो सकती है। धर्म के ठेकेदार एवं मजहबी समाजसेवी संस्थाएं इसका विरोध क्यों नहीं करती है, क्यों नहीं अपने शिक्षा पाठ्यक्रम में बुर्का प्रथा के खिलाफ शिक्षकों द्वारा छात्रों को इसके पक्ष-विपक्ष में अच्छाई बुराई पर व्याख्यान या लेक्चर देते।

दरअसल इस परिपेक्ष में तमाम दलों और संगठनों का दोहरा रवैया दिखता है। लोकतंत्र में हर उस कार्य के विरोध का नाटक होता आया है। जिसमें मजहब के अंदर के ठेकेदारों ने किसी प्रथा या व्यवस्था का विरोध किया हो। जिसमें राजनैतिक पार्टियां चश्मे द्वारा नफा नुकसान का मूल्यांकन करती हैं। इस प्रकरण पर किसी भी राजनीतिक पार्टी प्रमुखों ने बुर्का प्रथा के विरोध में बयान या वक्तव्य नहीं दिया है। जबकि गोल टोपी धारण करने वाली सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी और पार्टी रालोद के राजनीतिक रहनुमा मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में बुर्का प्रथा का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। इन दलों द्वारा किसी भी मंच पर इस प्रथा के विरोध स्वरूप कोई बयान नहीं दिया जाता। क्योंकि मुस्लिम, उलेमा और समाज नाराज हो जायेगा। इलेक्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा। ऐसे मौका परस्त दल नैतिकता का चोला तो ओढतें है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर उसका अनुपालन करने से डरते हैं। जबकि मुस्लिम महिलाएं कई मंचों पर बुर्का प्रथा का विरोध करती दिखती हैं। लेकिन उनको राजनीतिक जन समर्थन नहीं मिल पाता है। इस प्रथा का विरोध होना चाहिए। कठमुल्लों द्वारा थोपी गईं बुर्का प्रथा को समाप्त करने के लिए सभ्य समाज नेता अभिनेता को आगे आकर बयान देना चाहिए। वैसे हर उस सांप्रदायिक मुद्दे पर मुस्लिम अभिनेता कभी इस्लाम खतरे में है तो, कभी देश में रहना असुरक्षित है। लेकिन बुर्के पर इनकी जुबान बंद हो जाती है। इस मुद्दे पर वर्तमान सरकार को भी निर्णायक पहल करना ही चाहिए। तीन तलाक के तर्ज पर इस कुप्रथा के खिलाफ कानून बनना चाहिए।

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