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कुछ कहूं, तंत्र का मंत्र

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

संवेदना व्यक्त करने का तरीका कैसा हो, इसके लिए संवेदनशील होना आवश्यक नहीं। बस टाइमिंग सही हो, दो-चार खबर नवीस पालतू हों, जो इशारा मिलते ही अपने काम में लग जाए। एजेंडा? जनता का मददगार दिखता हो, लेकिन मददगार ना हो, नहीं तो जनता लालची हो जाएगी। जनता को आशावान बनाओ, लालची नहीं। निंदा का रस औषधि समझ कर पियो और ऐसा दिखलाओ कि नीलकंठ तुम्ही हो। परोपकार के लिए ही अवतरित हुए हो। कभी भी अपने आंतरिक जीवन यानी बेडरूम का दृश्य दिखने मत दो। तुम सबको दुभाषी विद्वता में पारंगत होना चाहिए। दिए गये वक्तव्य का मर्म समझ में लोगों के बिल्कुल ना आए। अगर आ जाए, तो उस वक्तव्य के कई अर्थ निकलते हों। यह सीख, ज्ञान ,एक प्रवचन में आये वयोबुजुर्ग खाटी नेता मार्गदर्शक मंडल में विराजते हुए नवोदित नेताओं को नेता और नेतृत्व की बारीकियों पर व्याख्यान देते हुए कहा। बीच-बीच में नेताजी का निजी दर्द भी उभर आता था। वह समय के चक्र को नहीं बदल सके। मार्गदर्शक मंडल का चयन उनका नहीं। बा इज्जत के साथ मार्गदर्शक मंडल में डाल दिए गए। दरअसल राजनीति की अर्धनग्न तस्वीर हमारे लोकतंत्र ने कई बार देखा है। मौजूदा दौर में लोक से ज्यादा लोग तंत्र से ज्यादा प्रभावित होते हैं। अब कहने को तो कार्यपालिका का एक मुख्य कार्य है लोकसेवा। लेकिन सलेक्शन के बाद लोक को हटा तंत्र सेवा में जिंदगी खपा देते हैं। तंत्र का मंत्र भी विचित्र होता है जैसा दिखता है वैसा है नहीं, जैसा है नहीं ,वैसा दिखता नहीं। लोकतंत्र के वाहक नेता और लोकतंत्र का आधार जनता, पब्लिक ये दोनों ही एक दूसरे को मूर्ख समझते हैं। जिसका मन जब होता है खासकर चुनावी मौसम में दोनों एक दूसरे को मूर्ख बनाते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र मजबूत होता है हालांकि नेता और जनता में युधिष्ठिर एवं शकुनि का द्यूत चलता रहता है। यदपि अंतिम लड़ाई शकुनि ही जीतता आया है और जैसा चाहता है वैसा राजा बनाता है, क्योंकि जनता की अपनी एक मर्यादा होती है वह उघाड तो सकती है लेकिन बिछ नहीं सकती और नेता बिछाने -बिछाने में माहिर होता है इसलिए वह नेता है, और नेतृत्व करता है।

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