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ब्यूरोक्रेसी के भ्रष्टाचार का सनसनीखेज खुलासा, अन्नदाता की जमीनों पर डाला करोंड़ों का ‘डाका’

लखनऊ। ब्यूरोक्रेसी के भ्रष्टाचार के तो ना जाने कितने किस्से अपने सुने होंगे, लेकिन आज हम आपको ब्यूरोक्रेसी के संगठित लूट की एक ऐसी कहानी से रूबरू कराने जा रहे हैं। जिसमें बड़े-बड़े अधिकारियों ने करोड़ों रूपयों से अपनी तिजोरी भरी। इस संगठित लूट और भ्रष्टाचार का खुलासा एक आईएएस अधिकारी के जरिए हो पाया। उन्होंने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए और एक-एक कर भ्रष्ट ब्यूरोकेस के नाम सामने आने लगे। ब्यूरोक्रेसी कि इसी लूट से जुड़ा हुआ एक अहम किरदार है आईएस निधि केसरवानी हैं। जिसके खिलाफ 6 सालों बाद निलंबन और एफआईआर की कार्रवाई के आदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिए है।

क्या है पूरा मामला
यह कहानी शुरू होती है वर्ष 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरठ से दिल्ली तक देश का सबसे उत्कृष्ट और स्मार्ट 14 लाइन के एक्सप्रेस वे को बनाने का ऐलान किया था। इसी एक्सप्रेसव को बनाने के लिए गाजियाबाद और हापुड़ में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इस पूरे एक्सप्रेसवे में लूट का ऐसा खेल खेला गया जिसे आप जानकार दंग रह जायेंगे। इसमें अधिकारियों और कर्मचारियों ने नोटिफिकेशन के बाद किसानो की जमीनों को कौड़ियों के मोल खरीदकर करोडो का मुआबजा हासिल किया।

अधिकारियों के दलाल सहखातेदार बन गए
ब्यूरोकेसी की लूट का खेल इतने तक ही सीमित नहीं था बल्कि इसमें जिन किसानों ने अपनी जमीनें नहीं बेंची उन्हें मुआबजे में कमीशन के लिए मजबूर किया गया और उनके साथ इन अधिकारियों के दलाल सहखातेदार बन गए। फिर किसानों के हिस्से के मुआबजे की रकम डकार गए। बतादें, नोटिफिकेशन के बाद किसानों से जमीन खरीदने वाले कोई और नहीं बल्कि इस अधिग्रहण से जुड़े हुए तमाम अधिकारी और कर्मचारियों के परिवारीजन ही थे।

इन अफसरों ने किया खेल
एडीएम वित्त एवं राजस्व घनश्याम सिंह ने अपने नाबालिग बेटे के नाम से किसानों से जमीन खरीदकर उसके मुआबजे को बढ़वा कर करोडों का खेल किया। इस पूरी मिलीभगत में गाजियाबाद के तत्कालीन दो जिलाधिकारियों की भी भूमिका संदिघ है। दरअसल जिस तरह से ऑर्बीट्रेशन के जरिये मनमानी तरीके से सर्किल रेट से 10 गुना ज्यादा मुआबजा किया गया उसमे तत्कालीन डीएम निधि केसरवानी और विमल कुमार की मिलीभगत भी साफ़ जाहिर होती है।

इस अफसर के चलते लूट का हुआ खुलासा
मामले का खुलासा शायद कभी न होता अगर मेरठ मंडल के ईमानदार कमिश्नर प्रभात कुमार ने किसानां की शिकायत पर जांच के आदेश न दिए होते। कमिश्नर के एक्शन के बाद सबसे बड़े भ्रष्टाचार का राज बाहर आया। जांच में सामने आया है कि अधिकारियों ने किसानों की जमीनों को अपने परिवार के सदस्यों के नाम करवा करोड़ों की रकम डकार गए। कमिश्नर की जांच में कई नाम सामने आए हैं।

इन अफसरों का नाम आया सामने
जांच में सबसे पहला नाम है तत्कालीन एडीएम एल ए एंड रिवेन्यू घनश्याम सिंह का है। इन्होंने अपने पुत्र शिवांग राठौर को ही किसान बनाकर 7 करोड़ से ज्यादा का चूना लगाया । इसमें दूसरा बड़ा गुनहगार था अमीन संतोष कुमार जिसने लगभग 12 करोड़ का चूना लगाया। अब इस पूरे खेल में दो बड़े आईएएस अधिकारियों की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ये अधिकारी थे। गाजियाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी विमल कुमार और उसके बाद आए तत्कालीन जिलाधिकारी निधि केसरवानी।

दस गुने से भी ज्यादा मुआवजा दिया गया
पूर्व डीएम विमल कुमार शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने जिस जमीन को अवार्ड दर 617. 59 रुपये थी। बिना किसी अनुमति के इसका मुआवजा 6500 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दिया जबकि यह अधिनियम एक जनवरी 2015 से लागू हुआ था। यानी दस गुने से भी ज्यादा मुआवजा दिया गया। कुछ इसी तरह का कारनामा विमल कुमार के बाद आई जिलाधिकारी निधि केसरवानी ने भी किया उन्होंने 1235 रुपये की दर को आर्बिट्रेशन में बढ़ाकर 6515 एवं 5577 रुपये कर दिया।

5 साल के बाद निलंबन की कार्रवाई
निधि केसरवानी खेल यहीं खत्म नहीं हुआ जब भ्रष्टाचार की शिकायत होने लगी। उन पर जांच की तलवार लटकने लगी। इन्होंने अपने ही मातहत अधिकारियों जिसमे तत्कालीन सीडीओ कृष्णा करुणेश, एसडीएम हनुमान प्रसाद मौर्य, एसएसपी तथा एसओ मसूरी की टीम थी की। जांच आख्या के आधार पर खुद क्लीन चिट हासिल कर ली। भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के इस नेक्सस ने 200 करोड़ से ऊपर के इस घोटाले को अंजाम दिया। हैरान कर देने की बात ये है की घोटाले के 5 साल बाद अब एक अधिकारी पर निलबन की कार्रवाई की जा रही है।

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