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मोहन की बावरी मीरा ने अपने प्यारे कन्हैया की स्थापित करवाई थी मूर्ति, मां गंगा के तट पर विराजे गिरधर गोपाल हर भक्त की मनोकामना करते हैं पूरी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप भी दर्शन कर कमाएं पुण्य

फतेहपुर। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों से लेकर घर-घर में सुबह से बोलो जय कन्हैया लाल के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है। इा पवित्र पर्व पर हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका निर्माण मोहन की बावरी मीरा बाई ने करवाया था। फतेहपुर शहर से करीब 20 किमी की दूरी पर स्थित शिवराजपुर में गिरधर गोपाल विराजमान हैं। गंगा के किनारे स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि आज भी यहां मीरा अपने मोहन की पूजा अर्चना करती हैं। साथ ही जो भी भक्त यहां आकर माथा टेकते हैं, उनकी हर मनोकामना भगवान श्रीकृष्ण पूरी करते हैं।

…तो मूर्ति अपने स्थान से नहीं हिली
शिवराजपुर का जिक्र हारे पौराणिक ग्रंथों में हैं। इसे छोटी काशी भी कहा जाता है। गंगा के किनारे मीरा के गिरधर गोपाल का मंदिर आज भी आस्था व विश्वास का केंद्र बना है। गंगा तट पर मोहन की बावरी मीरा ने अपने प्यारे कन्हैया की मूर्ति स्थापित की थी। इस पावन स्थल पर काफी दिनों तक रुककर मीरा कन्हैया की भक्ति में डूबी रहीं। बताया जाता है कि, मीरा बाई अपने गिरधर गोपाल की मूर्ति को लेकर शिवराजपुर आई थीं। गंगा में स्नान के वक्त उन्होंने मूर्ति जमीन पर रख दी। मीरा जब गिरधर गोपाल की मूर्ति साथ ले जाने लगीं तो मूर्ति अपने स्थान से नहीं हिली। इस पर उन्होंने यहीं पर मूर्ति स्थापित कर दी।

इस राजा ने मंदिर का करवाया था निर्माण
मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोय जैसे भजनों में डूबी रहने वाली मीराबाई के जाने के बाद चित्तौड़गढ़ के राजा ने शिवराजपुर में गिरधर गोपाल का भव्य मंदिर बनवाया। बताते हैं कि राजा साल में एक बार मंदिर के दर्शन के लिए जरूर आते थे। मंदिर की देखरेख, पूजा व प्रसाद के लिए सत्तर के दशक तक रजवाड़े से धन आता रहा। जन्माष्टमी के पर्व पर सुबह से मंदिर पर भक्तों का तांता लगा हुआ है। सुबह से भक्त अपने गिरधर गोपाल के दर्शन कर मन्नत मांग रहे हैं। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से लेकर छठी तक यहां हजारों की संख्या में भक्त आते हैं।

तब बालक रूप में दिखे श्रीकृष्ण
मंदिर के पुजारी पुरुषोत्तम बिहारी द्विवेदी ने बताया कि जब बाबा पुजारी थे तो उस समय बाबा व उनके भाई के बीच विवाद हो गया। इस पर दो में से किसी ने भी गिरधर गोपाल जी को भोग नहीं लगाया। तब चांदी का कटोरा लेकर बालक रूप बना गिरधर गोपाल जी ने लाला हलवाई के यहां से भोग का प्रसाद लाए। हलवाई मंदिर आए और कटोरा दिखाकर पूरी घटना बताई तो सभी को बहुत ही पश्चाताप हुआ था। तब से कभी ऐसा नहीं हुआ कि भगवान को भोग न लगा हो।

चित्तौड़ राज घराने से खर्च आता था
मंदिर में पुजारी पुरुषोत्तम बिहारी दीक्षित ने बताया कि मंदिर में प्रसाद के लिए चित्तौड़ राज घराने से खर्च आता था। यह खर्च आना अब बंद हो गया है। मंदिर के नाम रूरा में दस बीघे जमीन है। इसी से हुई आय पर प्रसाद व मंदिर की देखरेख का काम होता है। बताया कि विश्व में और कहीं भी अष्टभुजीय ऐसी अद्वतीय मूर्ति गिरधर गोपाल जी की नहीं है। कार्तिक भर लोग जब भी गंगा स्नान को आते हैं तो यहां आकर गिरधर गोपाल जी के दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं।

मीरा गिरधर गोपाल की पूजा के लिए आती हैं मंदिर
वहीं ग्रामीणों बताते हैं कि यहां आज भी मीरा अपने गिरधर गोपाल की पूजा के लिए हरदिन आती हैं। उनकी कईबार आहट सुनी और देखी गई। ग्रामीणों का कहना है कि, एक बार चोरों ने गिरधर गोपाल की मूर्ति चोरी कर ले गए थे। लेकिन मीरा के मोहन के चमत्कार के चलते मूर्ति मिल गई थी। ग्रामीण बताते हैं कि, जन्माष्टमी के पर्व पर देश के कोने-कोने से भक्त आते हैं। मां गंगा में डुबकी लगाकर पूजा करने के साथ वृत रखते हैं। रात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

शिवराजपुर को कहा जाता है धर्मनगरी
ग्रामीण नंद किशोर बताते हैं, राष्ट्रीय राजमार्ग के छह किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थिति गंगा तट का यह गांव धर्मनगरी के रूप में पहचाना जाता रहा है। यहां के पुराने मंदिरों के अवशेष शैव नगरी को प्रमाणिक करते हैं। गंगा की अद्भुत छटा के बीच यहां छोटे-बड़े मंदिरों की लंबी श्रृंखला है। यहां के प्राचीनतम मंदिरों में सिद्धेश्वर, कपिलेश्वर, अंगदेश्वर, पंचवटेश्वर, मुंडेश्वर, भैरवेश्वर, शगुनेश्वर, रसिक बिहारी मंदिर आदि हैं। ऐसी मान्यता है कि दुर्वासा ऋषि ने भी यहां आकर तपस्या की थी। इस पौराणिक स्थल के महत्व के चलते ही वर्ष 1872 में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी सरस्वती ने यहां एक वर्ष रहकर साधना की थी।

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