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कुछ कंहूं………..नेता और लोकतंत्र

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

लोकत्रंत्र को ढ़केलने में नेता बैल स्वरुप होता है। बिना नेता के लोकतंत्र जीवित नहीं रहेगा। लेकिन बैल को खुराक भी तो चाहिए लेकिन नेता की खुराक जनता है। जिस तरह बैल जमीन जोत कर तैयार फसल का तना खाता है, उसी तरह नेता भी हर पांच साल में एक बार जनता की मिजाजपुर्सी कर माननीय बनकर जनता की ऐसी-तैसी करता है। बैल पर किसान का अंकुश होता है। लेकिन नेता के साथ ऐसा नहीं होता उसे आवारा पंथी करने की पूरी छूट होती है। बशर्तें, सोशल मीडिया को मैनेज करते हुए उसे अपनी औलाद पैदा करके नेता बनाने की आजादी है। कहना ये है कि नेताओं में एक जीव की खूबी से काम नहीं चलता, उसमें दस बारह जानवरों और जंतुओं के गुण होने चाहिए। क्योंकि नेता इस धरा का बड़ा ही नायाब परजीवी है। जो मजबूत अवलंब का सहारा लेता है। कुछ दिन बाद वहीं नेता बेल, लताओं की तरह उसका वजूद खत्म कर देने की पूरी कोशिश करता है। नेताओं में एक विशेष गुण होता है कि वह रीढ़ विहीन होता है। आवश्यकतानुसार कभी तन कर, कभी झुककर या लेटकर मनवांछित फल प्राप्त करने का अवसर तलासते रहते है। नेता है तो वह सब कुछ कर सकता है। चुनाव में गरिमामयी पदों की धज्जियां उड़ा सकता है। जनता के सामने नाच सकता है, गा सकता है, क्योंकि वह नेता है। उसे जनता को बेवकूफ बनाना आता है। बेबुनियाद वादों से वह जनता को लुभा सकता है। उचित और अनुचित काम कर सकता है। लोकतंत्र में चुनाव एक महापर्व और मत देना जनता का महा कर्तव्य है। यदि जनता चुनाव में भाग नहीं लेगी तो उसे देशद्रोह माना जाता है कि जनता ने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया। उसे अपनी आवश्यकताओं अपनी जरूरतों के लिए चुनाव को बाधित करने का कतई हक नहीं है। वह अपने अधिकारों के लिए कभी भी चुनाव को ढ़ाल नहीं बना सकती। इससे लोकतंत्र को खतरा हो जाएगा। जनता यदि चाहे तो नेता के सामने रोये, गिड़गिड़ाये सड़क, पानी, राशन-गल्ला मोहल्ला की आवाज लगाएं। लेकिन नेताओं का लोकतंत्र बड़े सेठों गांव में जमीदारों और बाहुबलियों के यहां गिरवी रहता है। नेताजी चुनाव के समय वहां पहुंचते हैं। मुनादी करवा दी जाती है। जनता आती है। उसे वोट के लिए फरमान सुनाया जाता है और जनता अपना कर्तव्य पूरा करती है। लोकतंत्र में कलेक्टर अहम होता है जो नेता को राजा या रंक बना सकता है। कभी-कभी उसकी भी निष्ठा बड़ी पार्टियों की अनुकंपा से बदलती रहती है और बदलना भी चाहिए। लोकतंत्र फ्लैक्सिबल होता है। उच्च स्तरीय नेता ऐसा होता है कि उसे भूत भविष्य और वर्तमान का ज्ञान होता है। वह मन मुताबिक मुद्दे बनाता है, बदलता है और जनता से बदलवाता है। यह एक व्यंग्यात्मक लेख है…

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