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स्त्री पुरुष संबंधों में विवाद की मुख्य वजह

रंजना श्रीवास्तव, गाजियाबाद

स्त्री मन पर विजय नहीं,
वश देह प्राप्त का साधन है।
उसे जीतकर व्यक्ति सदा,
मदमस्त फिरा, वह पागल है।

महिला को अपने शरीर को पति के समक्ष प्रस्तुत करना शादी की मजबूरी है। लेकिन उसका मन मस्तिष्क इसकी गवाही नहीं देती है। बल्कि उसका मन कोसों दूर किसी की याद में रहता है। कि किसी स्त्री या लड़की को अपनी शादी के लिए उसकी इच्छा के विपरीत कई कारण होते है। उसके पीछे आर्थिक सामाजिक पारिवारिक धार्मिक कई तरह की मजबूरियां होती है। इस मजबूरी की वजह से उन दोनों के सुखी जीवन में दरार आती है। ऐसी अवस्था में दोनों के लिए इस आपसी सामंजस्य बनाए रखना मानसिक और शारीरिक पीड़ा को का कारण सिद्ध होता है। इस तकलीफ देय अवस्था में से गुजरना ना केवल स्त्री पुरुष दोनों के लिए बल्कि उनके बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। ऐसे हालात में किसी भी तरह के शारीरिक मानसिक अवस्था को झेलना आसान नहीं होता है। यह देखने वाली बात यह होती है कि कौन सी परिस्थितियां या कौन से मुख्य कारण है। जिसकी वजह से पति-पत्नी के बीच में संबंध मधुर नहीं रहते है। इतिहास पर नजर डालें, तो पाएंगे कि पाषाण युग से लेकर आज तक के युग में हर नर और मादा हर प्रकार के जीवन में आपसी संसर्ग से उत्पन्न जीवों से प्रकृति का फैलाव हुआ है। प्रकृति ने दोनों को संपूर्ण रूप से आजाद पैदा किया है लेकिन मानव समाज के निर्माण के साथ-साथ उसके तुलनात्मक अध्ययन के बारे में एक अंतर पैदा किया कि स्त्री पर हमेशा पुरूष का कब्जा रहा। कमजोर स्त्री पर पुरुष ने कब्जा किया हुआ है। जिसे स्त्री ने अपने पर पुरुष का प्यार समझकर सहर्षं स्वीकार किया है। कालांतर में उसको प्रेम-स्नेह करने वाला पुरुष कभी-कभार वह उसके पूरे व्यक्तित्व का स्वामी बन बैठता है। लेकिन आज के परिवेश में बदलते माहौल में ऐसा होना संभव नहीं दिखता है कि आप किसी भी स्त्री के शरीर के साथ-साथ उसके समूचे वजूद को पर हावी हो जाएं स्त्री के लिए दासी स्वरूप का  जीवन स्वीकार नहीं है।

लेकिन, इसके बाद भी संभोग की अतृप्ति को लेकर स्त्री, पुरुष के खिलाफ बगावत करने की स्थिति में स्त्री कभी नहीं रही। प्रकृति ने स्त्री को बच्चे पैदा करने का जो तोहफा दिया था, वहीं शक्ति उसकी कमजोरी बन गई! स्त्री यदि अपने पति के अलावा अगर किसी अन्य पुरुष से सम्भोग करती, तो उसके गर्भवती होने की आशंका से ही वह कांप उठती थी। ऐसे में वह अपने पति के इंतजार में केवल घुट-घुट कर मरने के सिवा कर भी क्या सकती थी? इन हालातों में पुरुषमन और स्त्रीमन दोनों एक-दूसरे से भिन्न ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विरोधी बनते चले गए।

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