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स्वास्थ्य विभाग-नगर निगम के गठजोड़ से खुले हॉस्पिटल, नर्सिंग होम के संचालकों ने उड़ाई मानकों की धज्जियां


दिनेश सिंह/गाजियाबाद
हॉस्पिटल -अस्पताल- चिकित्सालय -रुग्णालय बहुत ही पुनीत शब्द है जो भगवान के बाद जीवनदाता के रूप में सुप्रसिद्ध है। जहां आकर असाध्य मरीजों की आधि- व्याधि का सफलतापूर्वक इलाज होता है। लेकिन वहीं, अस्पताल एक सर्विस प्रोवाइडर जिसे सेवा प्रदाता भी कहते हैं जैसे व्यवहार करें? तो मरीजों के परिजनों पर क्या बीतेगी। इस शहर में ऐसे -ऐसे हॉस्पिटल हैं, जिनमें बैठे डॉक्टर जो विशेषज्ञ हैं अलग रोगों के इलाज कर रहे हैं. उस पर भी हॉस्पिटल के जो तय मानक हैं उसे भी पूरा नहीं कर रहे। गाजियाबाद के पिछड़े इलाके की पहचान बन चुके लाइनपार क्षेत्र में स्वास्थ्य माफिया बनकर संक्रामक बीमारियों के इस दौर में मरीजों से अनावश्यक जांच और दवाइयों के रूप में उगाही का सिलसिला जारी है. जिसकी बानगीं लाइनपार क्षेत्र में देखने को मिल जाएगी. जहां हर तरफ नर्सिंग होम -अस्पताल खुले हैं। लेकिन अगर आप अवैध मानक विहीन हॉस्पिटलों और नर्सिंग सेवा के इन चिकित्सकों से करुणा और दया की उम्मीद करते हैं. तो आप सब बड़ी गलतफहमी में हैं. क्योंकि इन हॉस्पिटलों और नर्सिंग होम संस्थानों की जमीनी हकीकत अस्पताल शब्द से कोसों दूर है। जब भी शिकायत मिलती है तो स्वास्थ्य विभाग या प्रशासन दिखावे के रूप में कार्यवाही करता है. अभी तक के इतिहास में ऐसा कोई भी संचालित हॉस्पिटल सरकारी शिकायतों पर दंडित करके बंद नहीं करवाया गया है।

प्रश्न है इन हॉस्पिटलों में ना ही पार्किंग सुविधा है और ना ही जन सेट की व्यवस्था है. ना ही लाइफ सपोर्ट सिस्टम ही है. मात्र हॉस्पिटल लिख देने से अस्पताल नहीं कहलाता. इन सभी हॉस्पिटलों की थोथी पोल कोविड के दौरान खुल गई थी. कि कितने चिकित्सालयों के पास आक्सीजन सिलेंडर तक नहीं थे। क्योंकि शिक्षा चिकित्सा पर हर व्यक्ति का नागरिक अधिकार है. इसलिए मौजूदा सरकार के संसाधन आबादी के लिहाज से पूरे नहीं हैं. इसलिए तमाम रियायतों एवं नाकामियों को नजरअंदाज करता प्रशासन इन्हें जमीन लाइसेंस व बैकिंग फाइनेंस की सुविधा प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराती है. और इस उम्मीद के साथ की जनसंख्या विस्फोट के कगार पर पहुंचा. हमारे देश में इन डॉक्टरों द्वारा रियायती सशुल्क उपचार मुहैया होगा. लेकिन क्या डाक्टर अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से कर रहे हैं।शायद नहीं। आपको बता दें कि इस समय सभी हॉस्पिटलों नर्सिंग होम एवं निजी क्लीनिक के लाइसेंस रिनुअल (नवीनीकरण) की प्रक्रिया जारी है।

इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग के हॉस्पिटल लाइसेंस प्रभारी डॉ सुनील कुमार त्यागी से बात की तो उनका कहना है. कि हमारे पास ऑनलाइन पेपर सभी संलग्नक मतलब प्रमाण पत्रों के साथ आता है. जांचोंपरांत हम संस्तुति देते हैं। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि हास्पिटल का मानक तो बहुत बड़ा है। नियमों के मुताबिक, लाइसेंस देना मुश्किल है। लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं देखते हुए कुछ मांगों को नजरअंदाज करते हुए हम सब नवीनीकरण करते हैं। हां कुछ नर्सिंग होम हॉस्पिटल बहुत ही अव्यवस्थित तरीके से चलाए जा रहे थे. उन पर कार्रवाई करते हुए उनका लाइसेंस कैंसिल कर दिया गया है। जांच प्रक्रिया जारी है. मैं खुद मौके पर जाकर के जांच करता हूं। अग्नि शमन व प्रदूषण विषय पर उनका कहना है कि संबंधित विभागों ने यदि लिखित स्वीकृति दी है. तो उनका अपना मापदंड होगा। हां मैं इतना ही कहूंगा कि बिना पूरे प्रमाण पत्र एवं प्रक्रिया के नवीनीकरण नहीं किया जा रहा है।

विचारणीय है कि शासन-प्रशासन स्वास्थ्य विभाग की शिथिल नीतियों के तहत पवित्र सेवा को चंद सेवादार बदनाम कर रहे हैं। यहां तक कि कई प्रैक्टिशनर जो अपने आपको डॉक्टर कहते हैं. उनकी डिग्रियों पर संदेह है। एवं कितनों के पास डिग्री ना होते हुए भी हॉस्पिटल -नर्सिंग होम -क्लीनिक चला रहे हैं। मजेदार बात यह है कि आम आदमी फर्जी डॉक्टर को जानते हुए भी इलाज करवा रहा है. लेकिन स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षकों को यह झोला छाप डॉक्टर नजर नहीं आते। अब सीएमओ ऑफिस को ये गैर डिग्री धारी प्रैक्टिस नर क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं। ये तो विभाग ही बता पायेगा।

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