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राजनैतिक पार्टी के उत्तराधिकारी की योग्यता नहीं वंशानुगत होना आवश्यक है

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

उत्तराधिकारी यानि उत्तर का अधिकार, दायित्व का निर्वाहन इसमें संस्थान मठ, मंदिर, प्रतिष्ठान, खेती, बाग -बगीचा कहे तो चल- अचल संपत्ति अपनी संतान को या ट्रस्ट है तो पदेन अध्यक्ष किसी योग्यजन को अपने जीवनकाल में उत्तराधिकारी बनाता है। जिसका ड्राफ्ट वसीयत या रजिस्टर बिल जैसे प्रयागराज अखाड़े के संत नरेंद्र गिरी ने अपनी वसीयत को कई बार परिवर्तित किए अब बलवीर गिरी उत्तराधिकारी हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात है कि सलेक्शन तक तो समझ में आता है। लेकिन जहां इलेक्शन है वहां पर भी राजनीतिक पार्टियां में भी उत्तराधिकारी का चयन होता है। भारत विश्व का इकलौता लोकतांत्रिक देश है जहां की पार्टी अध्यक्ष वंशानुगत होता है। यदि बाप ने पार्टी बनाई तो बेटा ही मालिक है। जैसे किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चाहे उसमें योग्यता हो या ना हो अपने यहां भाजपा जरूर अपवाद है। शायद इसलिए सफल भी है। मुलायम सिंह, लालू, बीजू पटनायक, जगन रेड्डी परिवार शिवसेना, पीडीपी, लोकदल समेत सैकड़ों,,, इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांग्रेस जहां पर नेता तो भाग रहे हैं जिनका कहीं ठिकाना नहीं है। वह 23 गण अघोषित उत्तराधिकारी को धकेल रहे हैं। लेकिन मां के पल्लू पकड़ मजाल है कोई सरका सके।

ताज्जुब यह है कि बिना किसी पद के सारे फैसले उत्तराधिकारी ले रहा और 23 खांटी नेता एक-दूसरे का मुंह ताक रहे हैं। सुना गया कि वामपंथियों को उबारकर कन्हैया कांग्रेस बचाने आयें हैं। पंजाब में चुनाव से पहले ही कांग्रेसी कुनबा बिखर गया, बुद्धिजीबी कह रहें हैं कि सिद्धू अभी भी भाजपाई है। वे पंजाब कांग्रेस को जमींदोज कर किसी और दल में चलें जायेंगे। उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी जबरदस्ती पिता प्रेम में अध्यक्षी हथियायें भतीजे को चचाने स्पष्ट फरमान सुना दिया या तो गठबंधन करो नहीं तो हमारे प्रत्याशी सपा के खिलाफ मैदान में उतरने को आतुर हैं।

इतिहास गवाह है कि नवीन पटनायक को छोड़ दें तो जबरदस्ती के उत्तराधिकारी अक्सर कमजोर रहे हैं। चौधरी चरण सिंह से अजीत सिंह का कहीं मेल नहीं खाता। चौधरी देवीलाल के पुत्रों का हाल बेहाल है। मुलायम, लालू द्वारा अपनी नयी पार्टी बना कर नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने की कला अद्भुत थी। वो पकड़ उत्तराधिकारियों में नहीं दिखती, हो सकता है समय अनुसार कुछ अच्छा कर सके। लेकिन भाजपा जैसा मजबूत संगठन के विरुद्ध कुछ नया करना ही पड़ेगा। बाल ठाकरे का कुशल नेतृत्व उद्धव ठाकरे में कतई नहीं दिखता। शरद पवार के बाद एनसीपी में कौन?

लब्बोलुआब यह है कि मठ, मंदिर और टाटा जैसी कंपनी भी योग्यता आंक कर उत्तराधिकारी घोषित करती है। इसका एक नायाब उदाहरण गोरक्ष पीठ के नाथ संप्रदाय में उत्तराधिकारी विगत तीन पीढ़ियों को ही देखें तो दिग्विजय नाथ, महंत अवैद्यनाथ वर्तमान में योगी आदित्यनाथ ऐसे शिष्य जो गुरु के गुरूता को अपनी योग्यता से विस्तार दिये ना कि सपा और राजद की तरह जहां एक दूसरे को परिवारीजन धकिया रहे हैं। समाजवादी पार्टी हिंदुस्तान की सबसे बड़ी परिवारी पार्टी है। जहां पूरा कुनबा ही 2012की सत्ता में एक समय परिवार में जितने भी बालिग थे सभी पर कुछ ना कुछ राजकीय दायित्व सौंपा गया था। चाहे वो कंधे दायित्व संभालने के योग्य रहें हों या ना रहें हों।लेकिन वह जनता का प्रतिनिधित्व करते थे और तारीफ इस राज्य की जनता का भी है जो ऐसे दलों को भी अपना भरपूर समर्थन देते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि राजनीतिक पार्टियों में दायित्व का चयन योग्यता नहीं बल्कि पारिवारिक पृष्ठभूमि है इसलिए हमारे यहां कहने को तो लोकतंत्र है लेकिन यह लोकतंत्र सड़क पर पड़ी बीमार गाय जैसी है। जिसकी औकात कहने को तो माता है लेकिन भूखी प्यासी सड़क पर मर रही है। ऐसे दलों से जनता के विकास का सपना देखते हैं और रामराज की डुगडुगी बजाते हैं। जो भी सरकार आती है। वहीं राशन कार्ड या खैरात पर अपनी फोटो एवं कार्ड का कलर बदल देती है। यह लोकतंत्र है या सामंतवाद कहना मुश्किल है।

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