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ज्ञानवापी मस्जिद की सामने आई यह कहानी, मंदिर के नीचे तहखाना और उसमें मिली कच्छ की ‘रानी’

वराणसी। मंदिर और मस्जिद के दावे के बीच ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे का काम एडवोकेट कमिश्नर अपनी टीम के साथ कर रहे हैं। एक पक्ष दावा कर रहा है कि, भोलेनाथ के प्राचीन मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। जबकि दूसरा पक्ष इस दलील का सिरे से खारिज कर रहे है। इस बीच विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने और मस्जिद बनवाने के बारे में अलग-अलग कहानियां भी सामने आ रही हैं। एक ऐसी ही कहानी के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं। जिसे कांग्रेस के अध्यक्ष रहे पट्टाभि सीतारमैय्या ने किताब के जरिए आमजन तक पहुंचाई थी। 1942 से 1945 के दौरान जेल में रहने के दौरान सीतारमैय्या ने एक जेल डायरी लिखी थी। 1946 में यह ’फीदर्स एंड स्टोन्स’के नाम से छपी थी। इसमें उन्होंने दो पन्नों में ज्ञानवापी मस्जिद के बारे में लिखा है। पट्टाभिसीतारमैया की पुस्तक में विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने संबंधी औरंगजेब के आदेश और उसकी वजह के बारे में लिखा गया है।

’फीदर्स एंड स्टोन्स’ में क्या लिखा है
सीतारमैय्या ने अपनी किताब में लिखा है कि, ’एक बार औरंगजेब बनारस के पास से गुजर रहे थे। सभी हिंदू दरबारी अपने परिवार के साथ गंगा स्नान और भोलेनाथ के दर्शन के लिए काशी आए। मंदिर में दर्शन कर जब लोगों का समूह लौटा तो पता चला कि कच्छ की रानी गायब हैं। अंदर-बाहर, पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में तलाश की गई लेकिन उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। सघन तलाशी की गई तो वहां एक तहखाने का पता चला। तहखाने में जाने वाला रास्ता बंद मिला, तो उसे तोड़ दिया गया। वहां बिना आभूषण के रानी दिखाई दीं।

और मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया
किताब में उन्होंने आगे लिखा है कि, पता चला कि यहां महंत अमीर और आभूषण पहने श्रद्धालुओं को मंदिर दिखाने के नाम तहखाने में लेकर आते और उनसे आभूषण लूट लेते थे। इसके बाद उनके जीवन का क्या होता था, पता नहीं। औरंगजेब को जब पुजारियों की यह काली करतूत पता चली तो वह बहुत गुस्सा हुआ। उसने घोषणा की कि जहां इस प्रकार की डकैती हो, वह ईश्वर का घर नहीं हो सकता। और मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया।

रानी ने बनवाई मस्जिद
किताब में उन्होंने लिखा है कि औरंगजेब के चलते रानी की जान गच गई और वह मुगलशासक को खुश करने के लिए मंदिर के मलबे से मस्जिद का निर्माण करवा दया। इस तरह काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में मस्जिद अस्तित्व में आया.। बनारस मस्जिद की यह कहानी लखनऊ में एक नामचीन मौलाना के पास दुर्लभ पांडुलिपि में दर्ज थी। मौलाना ने इसके बारे में सीतारमैय्या के किसी दोस्त को बताया था और कहा था कि जरूरत पड़ने पर पांडुलिपि दिखा देंगे। बाद में मौलाना मर गए और सीतारमैय्या का भी निधन हो गया। लेकिन वह कभी अपने उस दोस्त और लखनऊ के मौलाना का नाम नहीं बता पाए।

सीतारमैय्या की किताब ने भ्रम फैलाया
हिंदू पक्ष का कहना है कि पट्टाभि सीतारमैय्या की किताब ने भ्रम फैलाया है और इसी तरह कुछ इतिहासकारों ने औरंगजेब के काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने को सही ठहराया था। हिंदू पक्ष और संतों का कहना है कि औरंगजेब के समय लगभग रोज की घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया जाता था लेकिन कहीं भी रानी से दुष्कर्म या लूटपाट जैसी किसी भी घटना का जिक्र नहीं मिलता है। कुछ संत तो यह भी कहते हैं कि इतिहास में औरंगजेब की बंगाल और बनारस की किसी यात्रा का जिक्र ही नहीं मिलता है तो पट्टाभि सीतारमैय्या को कैसे पता चल गया।

शिवलिंग और देवी-देवताओं के विग्रह निकलेंगे
पेशे से पत्रकार राम प्रसाद ने 1991-92 में ज्ञानवापी मस्जिद पर स्टोरी की थी। उन्हें परिसर में जाने की इजाजत मिली। एक मीडिया संस्थान से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया है कि, वहां पत्थर के ऊपर पत्थर रखे हुए थे। अगर उन्हें हटाया जाए तो वहां टूटे-फूटे शिवलिंग और देवी-देवताओं के विग्रह भी निकलेंगे। उस समय हम उठाने की स्थिति में नहीं थे। राम प्रसाद ने ज्ञानवापी के भीतर तहखाने को भी देखा था। वह बताते हैं कि बाएं तरफ वहां टूटे-फूटे मंदिर के मूल ढांचे के अवशेष भारी मात्रा में पड़े हैं। कुछ लंबे खंभे हैं। उन पत्थरों पर जो भी कलाकृतियां बनी हैं, वही कलाकृतियां आज भी मंदिर के मूल ढांचे में दिखाई देती है।

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