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बेलगाम ब्यूरोक्रेसी

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

मुख्य न्यायाधीश का अफसरशाही को लेकर के सख्त टिप्पणी करना वाजिब लगता है। अधिकारियों के व्यवहार में परिवर्तन हो रहा है। कुछ अधिकारी सत्ताधारी दल की ओर झुकाव रखते देखे जा सकते हैं और उनको खुश करने के लिए कुछ ना कुछ प्रयास करते हैं। आज का ताजा मामला लखीमपुर खीरी प्रकरण से है। जहां पर केंद्रीय मंत्री के बेटे पर हत्या का आरोप के बावजूद गिरफ्तारी ना होना अपने आप में अफसर शाही पर प्रश्न चिन्ह है। इसी तरीके से हरियाणा में एक एसडीएम पुलिसकर्मियों को यह आदेश देते नजर आता है कि जो भी किसान आगे बढ़े, उनका सिर फोड़ दो। कुछ ऐसा ही मामला गोरखपुर में हुआ, जहां पुलिस वालों ने एक निर्दोष व्यापारी की निर्मम पिटाई कर दी। जिससे उसकी मौत हो गई। इन सब घटनाओं को अगर देखा जाए तो लोक सेवक किस तरह अपनी नैतिकता के साथ इतनी जल्दी समझौता कर लेते हैं। ऐसे क्या कारण है कि नौकरशाही को आज विधायिका के सामने बिछते हुए देखा जाता है। प्रथम दृष्टया जो नजर आता है, लोक सेवकों को असीम शक्तियां दी गई है और उनको जरूरत से ज्यादा संरक्षण दिया जाता है। जवाबदेही की प्रक्रिया इतनी सरल है कि बहुत आसानी से अपने बचाव का रास्ता निकाल लेते हैं। दूसरा कारण जो नजर आता है, इन सेवाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते कुछ लोकसेवकों की तटस्थया प्रभावित हो रही है। पूर्व में लोक सेवकों के ढांचे में सुधार करने के लिए बनाई गई समितियां और आयोग की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। मुख्य कारण जो नजर आता है कि दोषपूर्ण चयन प्रक्रिया उससे भी विशेष कारण है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पैदा होना, इसी कारण से लोकसेवक किसी विशेष राजनीतिक दल के प्रति समर्पित होकर खो जाते हैं और उनके भ्रष्टाचार से उपजे तंत्र से मलाईदार पदों पर आसीन रहते हैं और उस पद पर इसलिए बरकरार रह पाते हैं कि वह सत्ता का दिशा सत्ताधारी के मन मुताबिक संचालित कर सके और सेवानिवृत्त के बाद इन्हीं दलों के माध्यम से होते हुए मंत्री पद तक पहुंच जाए, ऐसे माहौल में उनकी निष्ठा बदलती रहती हैं, वर्तमान में अगर केंद्र सरकार की सत्ता को देखा जाए तो अहम मंत्रालयों पर ब्यूरोक्रेसी का ही कब्जा है। अगर भारत को विश्व पटल पर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत में विकास करना है तो, लोकतंत्र के मूल्यों में जनता का विश्वास बनाए रखना होगा नहीं तो, हमारी लोक सेवाएं एक राष्ट्र का विकास तो दिखाएंगे, लेकिन लोकतंत्र में सिर्फ तंत्र ही बढ़ेगा लोक यानी जनता, पब्लिक मात्र गरीब और दुखियारी ही नजर आएंगी।

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