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प्राचीन सभ्यताओं और अजब-गजब मंदिरों के लिए जाना जाता है महानगर का ये इलाका, ‘मिनी खजुराहो’ में बीरबल ने पकाई थी खिचड़ी, यहीं से होती है मानसून की सटीक भविष्यवाणी

कानपुर। एक वक्त कानपुर देश की आर्थिक राजधानी में शुमार थी। एशिया का मैनचेस्टर को धार्मिक और क्रांतिकारियों की नगरी भी कहा जाता था। बिठूर स्थित लव-कुश मंदिरों के अलावा घाटमपुर तहसील के भीतरगांव का इलाका प्राचीन सभ्यताओं और अजब-गजब मंदिरों के लिए जाना जाता है। यहां चंदेल वंशीय राजाओें द्वारा बनवाया गया लाखौरी ईटों का शिव मंदिर भी है। इसके अलावा बीरबल ने यहीं पर मंदिर का निर्माण करवाया था। जबकि, सबसे ज्यादा आकर्षक का केंद्र मानसूनी पत्थरों से बना जगन्नाथ मंदिर है। ये मंदिर बारिश की भविष्वाणी करता है।

मंदिरों की पूरी श्रृंखला
कानपुर शहर से करीब 40 किमी की दूरी पर स्थित घाटमपुर तहसील है। यहां से पांच किमी की दूरी पर भीतरगांव है। यहां ऐतिहासिक मंदिरों की पूरी श्रृंखला है। मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराने हैं और सबका अपना-अपना महत्व है। यहां हरदिन सैकड़ों पर्यटक आते हैं और मंदिरों को दर्शन करने के साथ फोटो भी शूट करते हैं। इसे मिनी खजुराहो भी कहा जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि देश ही नहीं विदेश से भी लोग यहां आते हैं और मंदिरों की आकृतियों को ध्यान से देखकर गदगद हो जाते हैं। ग्रामीण कहते हैं कि, अगर सरकार ने यहां का विकास करवाया होता तो ये क्षेत्र पर्यटन के रूप में पहचाना जाता।

ईंटों से निर्मित है ये मंदिर
भीतरगांव में सातवीं सदी में बनवाया गया गुप्तकालीन मंदिर इतिहास में दर्ज है। ईंटों से निर्मित इस मंदिर की खोज का श्रेय अंग्रेज पर्यटक कानिंघम को दिया जाता है। मंदिर के गर्भग्रह में कोई मूर्ति नहीं है। जबकि, ईंटों से निर्मित दीवारों पर पशु-पक्षियों और मनुष्यों की मैथुनरत प्रतिमाएं (खजुराहो) की तर्ज पर खंडित अवस्था में हैं। मंदिर में बने फलकों की कलाकृति दर्शनीय है। मंदिर के दर्शन के लिए आए छतरपुर निवासी हरिशरण बताते हैं कि, यहां का नजारा बिलुकल खजुराहो की तरह है। अच्छी सड़क और सुविधाओं के अभाव से यहां हमलोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

उड़ीसा के पुरी की तर्ज पर बना है मंदिर
भीतरगांव कसबे से घाटमपुर की ओर चलने पर बेंहटा-बुजुर्ग गांव में जगन्नाथ जी का भव्य और प्राचीन मंदिर है। पुरी (उड़ीसा) की तर्ज पर निर्मित मंदिर के मुख्य गुबंद की छत पर लगे मानसूनी पत्थर की विशेषता है कि बारिश के दिनों में मानसून सक्रिय होने से एक सप्ताह पहले ही पत्थर से पानी की बूंदें टपकनी शुरू हो जाती हैं। पत्थर से पानी की बूंदें गिरने का रहस्य वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए हैं।

लाखौरी ईंटों से बना भद्रेश्वर महादेव का भव्य मंदिर
मुगल रोड के किनारे बसे निबियाखेड़ा गांव में लाखौरी ईंटों से बना भद्रेश्वर महादेव का भव्य मंदिर है। कलात्मक लाखौरी ईंटों से बने मंदिर का निर्माण चंदेल वंशीय राजाओं द्वारा कराया जाना बताया जाता है। मंदिर की कलाकारी देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। मंदिर के केयर टेकर रामनरेश ने बताया कि यहां पर शिवरात्रि और सावन के सोमवारों पर दूर-दूर से लोग दर्शन-पूजन करने आते हैं।

पिसनहरी बुढ़िया का मंदिर
प्रमुख मंदिरों के साथ ही कानपुर के घाटमपुर में हमीरपुर रोड के किनारे स्थित पिसनहरी बुढ़िया का मंदिर, बीहूपुर गांव में स्थित देवी फूलमती का मंदिर, परौली और कोरथा गांवों में स्थित प्राचीन शिव मंदिर और रिंद नदी के किनारे बसे करचुलीपुर गांव के औलियाश्वर महादेव का मंदिर भी दर्शनीय हैं और सभी पुरातत्व के अधीन हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार यहां पर आवागमन के साथ सड़क, बिजली और पानी की ठीक से व्यवस्था कर दे तो आने वाले वक्त में ये इलाका बड़े पर्यटक हब की तौर पर उभर सकता है।

घाटमपुर में बीरबल का मंदिर
तहसील मुख्यालय से महज 10 किमी दूर और सजेती कस्बे से एक किमी दूर अज्योरी गांव में बाबा बिहारेश्वर मंदिर लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र स्थान पर आसपास से ही नहीं, बल्कि दूर-दूर से भी शिवभक्त दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर का अपना इतिहास है। कहा जाता है कि मंदिर की नींव बीरबल ने रखी थी। प्राचीन मंदिर में स्थापित शिवलिंग कब का है और कहां से आया। इस बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं हैं पर शिवलिंग कुछ अलग किस्म का जरूर है।

1580 में मंदिर का हुआ था निर्माण
मंदिर के पुजारी ने बताया कि मंदिर को 1580 में अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल ने बनवाया था। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि युद्ध के दौरान वीर शिवाजी ने भी यहां शरण ली थी। पुजारी ने बताया कि मंदिर के प्रवेश द्वार के बाहर एक स्तंभ है। कहा जाता है कि यह बीरबल ने खजुराहो से लाकर यहां स्थापित कराया था। मान्यता है कि स्तंभ की कभी सटीक नाप नहीं की जा सकती, क्योंकि हर बार की नाप में इसकी लंबाई बढ़-घट जाती है। प्रत्येक सोमवार को मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। सावन में शिवलिंग के दर्शन करने दूर-दूर से लोग आते हैं।

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