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Dussehra 2022: सच में रावण पराक्रमी के साथ है महादानी, मोहम्मद इकबाल की चार पीढ़ियों को ‘दशानन’ दे रहा दाल-रोटी

कानपुर। विजय दक्षमी का पर्व पूरे देश में बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जा रहा है। कोरोना महामारी के बाद इस वर्ष लोग बाजार जाकर खरीदारी कर रहे हैं तो पुतले बनाने वाले कारीगर भी गदगद हैं। पंडालों में रामलीला का मंचन हो रहा है और दशहरे की शाम रावण का पुतला दहन होगा। कानपुर की एतिहासिक परेड रामलीला के मंचन के 146 साल पूरे हो गए हैं और यहां भी दशानन का विकराल पुतला खड़ा है। जिसे मोहम्मद इकबाल ने तैयार किया है। मोहम्मद इकबाल की चार पीढ़ियां इस काम से जुड़ी हैं और उनके परिवार का भरण-पोषण इसी कार्य के जरिए होता है।

बिना पैसे के तैयार किया था रावण का पुतला
रावण का पुतला बनाने वाले मोहम्मद इकबाल रेल बाजार रामलीला मैदान में पिछले 45 वर्षों से रह रहे हैं। मोहम्मद इकबाल बताते हैं कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से पुतले बनाकर जीवन यापन कर रहा है। परिवार में रहमतउल्लाह से पुतले बनाने का हुनर मिला, इसके बाद बाबा नूर मोहम्मद और फिर उनके बाद पिता मोहम्मद सलीम ने पुतले बनाने की परंपरा आगे बढ़ाए रखा और अब वह भी इस हुनर से परिवार का पेट पाल रहे हैं। बताते हैं कि उनका परिवार रावण के अलावा मेघनाथ, कुम्भकरण के पुतले भी बनाता चला आ रहा है। रेलबाजार में रामलीला मंचन के अवसर पर हमारे हाथ के बने रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण के पुतलों को भगवान श्रीराम दहन करते हैं। इकबाल कहते हैं उनके बाबा ने सबसे पहले बिना पैसे लिए कानपुर में सबसे बड़े रावण के पुतले को बनाया था। उनके निधन के बाद पिता और अब हम विरासत संभाल रहे हैं। इकबाल कहते हैं कि वो 15 साल की उम्र से पुतले बना रहे हैं।

उसी समय मेरे बाबा को ये काम करने को मिला
मोहम्मद इकबाल ने बताया मेरे बाबा क्राफ्ट का ही काम करते थे, जो कपडे़ की गुड़िया और जानवर बनाते थे। साथ ही कागज के भी कई सामान बनाकर बाजार में बेचते थे। उन्होंने अपने इस हुनर को मेरे अब्बू मो. सलीम को सिखाया। जिसे हमने और बहन ने भी सीखा। घर में सभी क्राफ्ट का काम करते है। जब रेलबाजार में रामलीला का मंचन की शुरुवात हुई तब उस समय तत्कालीन कमेटी के सामने रावण बनाने की समस्या खड़ी हो गई। उसी समय मेरे बाबा को ये काम करने को मिला। पहले तो कुछ लोग तैयार नहीं थे मगर जब कोई कारीगर नहीं मिला तब इनको 2 दिन में 10 फीट का रावण बनाने को बोला गया।’जिसे बाबा और अब्बू ने मिलकर तैयार कर दिया था। कमेटी ने अब्बू को इस काम के बदले पैसा देना चाहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। रामलीला कमेटी इकबाल के अब्बू के इस काम से प्रभावित होकर पुतले बनाने का कामे ही सौंप दिया गया, और रामलीला आने के 2 महीने पहले ही इनको रावण, मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले को बनाने का ऑर्डर दे दिया जाता था।

90 से एक लाख रुपये तक मिलते हैं
इकबाल बताते हैं कि, एक समय शहर की तकरीबन सभी रामलीला में परिवार के बनाए पुतले दहन के लिए जाते थे। इकबाल ने बताया कि शहर के अलावा फतेहपुर, उन्नाव, हमीरपुर, झींझक, सिकंदरा, जालौन, उरई, बिल्हौर सहित कई जिलों से पुतले बनाने के आर्डर मिलते हैं। इकबाल बताते हैं कि मंदिरों के लिए कलाकृति और दशहरा के पुतलों के आर्डर इस वर्ष मिले हैं। 30 से 40 फुट तक के पुतलों के लिए 25 से 30 हजार और 80 से 90 फुट के पुतलों के लिए 90 से एक लाख रुपये तक मिलते हैं। ऐसे आठ से 10 पुतले बनाने से पूरे परिवार का साल भर गुजर-बसर हो जाता है। इकबाल बताते हैं कि रावण का पुतला ही दस दिन के काम में साल भर के लिए परिवार को रोटी देता है। कोरोना काल में जब दशहरा मेला नहीं हुए तो परिवार के लिए रोटी के लाले हो गए थे। अब एक बार फिर पुतलों ने सहारा दिया है और बड़े पुतलों के आर्डर ज्यादा मिले। पूरे परिवार के साथ सहयोगियों को लगाया और आर्डर पूरे किए।

तब जाकर ये पुतला तैयार होता है
इकबाल बताते हैं कि पहले सारे रॉ मटेरियल को इक्कठ्ठा करते है। फिर ऑर्डर के मुताबिक इनका ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद इनपर रंग बिरंगे कागज लगाए जाते है, तब जाकर ये पुतला तैयार होता है। इकबाल बताते हैं कि, परिवार में चाचा मो. कल्लू, शकील, इमरान और गड्डू भी पुतले बनाने में मदद करते हैं। इकबाल बताते हैं कि, दो वर्ष पहले एक लाख रूपए का रावण का पुतला हमने बनाया था। इस वर्ष भी इसकी लागत करीब डेढ़ लाख रूपए है। रेलबाजार रामलीला कमेटी के महामंत्री अजय गुप्ता ने बताया, रामलीला में रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है तो हमारे रामलीला के लिए पुतलो को तैयार करने वाले मो. इकबाल इस इलाके के सौहार्द और भाई चारे के प्रतीक है। इनको काम सौपने के बाद हम सब पुतले की तरफ से निश्चिन्त हो जाते है, और फिर बाकी काम में लग जाते है।

 

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