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Kanpur Zoo News : इस इलाके में बसे ‘नागलोक’ में नागों की ‘दमाद’ की तरह होती है खतिरदारी, 28 लाख के चूहे और चार लाख के खरगोश खाकर कोबरा सांप और अगजर बने ‘बहुबली’

कानपुर। शहर के नवाबगंज थानाक्षेत्र स्थित चिड़ियाघर की शान देश ही नहीं विदेशों में हैं। यहां पर अनेक प्रकार के वन्यजीवों को रखा गया है। जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से दर्शक आते हैं। वन्यजीवों की देखरेख के लिए जहां डॉक्टर्स से लेकर अन्य कर्मचारी लगाए गए हैं तो इनके भोजन की व्यवस्था की गई है। चिड़ियाघर में सबसे ज्यादा खर्च कोबरा सांप और अजगर के खाने में आता है। एक वर्ष में विषैले जन्तु की दावत में 32 लाख रुपये खर्च हुए हैं। जिसमें 28 लाख के चूहे तो चार लाख के खरगोश हैं।

चिड़ियाघर स्थित सांपों के लिए अगल से बाड़े बनवाए गए हैं। जिसमें कई प्रकार के सांपों को रखा गया है। शीशे के केबिन में कैद ये सांप-अजगर रविवार की हर शाम जमकर दावत उड़ाते हैं। खाने के रूप में इनके सामने पंसदीदा भोजन चूहे और खरगोश रखे जाते हैं। जू के डॉक्टर नासिर खान के मुताबिक, रविवार के दिन सांपों के केबन पर खरगोश और चूहों को डाला जाता है। जिन्हें सांप और अजगर एक-एक कर खा जाते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि, सांप को शिकार को पचाने में काफी समय लगता है। सोमवार को चिड़ियाघर बंद रहता है, ऐसे में मंगलवार सुबह इन को उनके बाड़े में छोड़ा जाता है।

सर्दी बढ़ते ही कानपुर चिड़ियाघर (जू) में सांपों के बाड़े को बंद कर दिया जाता है। तितली घर, मछली घर, रात्रिचर जीव गृह की तरह ही सरीसृप गृह भी दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय है। दर्शक जू में अलग-अलग प्रजाति के सांपों के संसार को देखने के लिए हजारों की संख्या में आते हैं। डॉक्टा के मुताबिक, हाइबरनेशन को शीत निद्रा या सुप्तावस्था भी कहते हैं। सांप जाड़े के असर से बचने के लिए इस मौसम में करीब 3 महीने तक लगातार सोते रहते हैं। इसके चलते सरीसृप गृह बंद कर दिया जाता है। तापमान बढ़ने पर मार्च से सरीसृप गृह दर्शकों के लिये दोबारा खोल दिया जाता है।

चिड़ियाघर में करीब सवा सौ प्रजातियों के वन्यजीव और पशु पक्षी हैं, जिनमें से ज्यादातर वन्यजीव और पक्षी शाकाहारी हैं। इसके बावजूद मांसाहारियों की खुराक पर आने वाला खर्च उनकी खुराक के खर्च का करीब तीन गुना है। यहां पांच शेर, 18 तेंदुए और 9 बाघ हैं जिनको रोजाना मीट परोसा जाता है। इन विडालवंशियों का पेट भरने के लिए चिड़ियाघर प्रबंधन सालभर में करीब 1.48 करोड़ रुपये का मीट खरीदता है। इसी में से लकड़बग्घा, गीदड़ और कठूमर को मीट दिया जाता है।

चिड़ियाघर में जानवरों के इलाज पर एक साल में करीब 6.50 लाख रुपये का खर्च आता है। इसके पीछे खास वजह है कि यहां इन जीवों को हर मौसम के हिसाब से मल्टी विटामिन और कैल्शियम की दवाएं दी जाती रहती हैं। पशुचिकित्सक डॉ.अनुराग सिंह, डॉ.नासिर और डॉ.नितेश कटियार के मुताबिक ज्यादातर जानवर स्वस्थ हैं। हालांकि कई बार आपसी लडाई में हिरण घायल हो जाते हैं। डॉक्टर्स बताते हैं कि, वन्यजीवों पर 24 घंटे नजर रखी जाती है। कर्मचारियों के अलावा सीसीटीवी कैमरे के जरिए इनपर नजर रखी जाती है।

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