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कानपुर सावन विशेष : हजारों वर्षों से जिंदा एक ‘इंसान’ इस मंदिर में शिव की करता आ रहा अराधना, सफेद लिबास में ‘अमर महामानव’ को देखने का ग्रामीणों ने किया दावा

कानपुर। शहर से 40 किमर की दूरी पर स्थित शिवराजपुर गांव में प्राचीन शिवमंदिर है। ग्रामीणों का दावा है कि, यहां हजारों वर्षों से एक जिंदा इंसान सुबह पहर प्रकट होता है। वो ‘अमर महामानव’ सावन के हर सोमवार को सबसे पहले महादेव को जल चढ़ाकर गायब हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि, आठ फुट लंबा अमर महामानव अश्वत्थामा है। जो अचानक तेज रौशनी के साथ दिखाई देता है, खड़ाऊं की आवाजें आने लगती हैं और फिर अचानक सन्नाटा छा जाता है।

शिवराजपुर के खेरेश्वर धाम का इतिहास
खेरेश्वर मंदिर कानपुर जिले के शिवराजपुर में स्थित है। सावन के पूरे माह यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन-पूजन करने आते हैं। इस मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है, कि सावन माह में यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होतीं हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग लगभग 5 हजार वर्ष पुराना है। लोगों का मानना है कि यह शिवलिंग को महाभारत काल के समय से स्थापित है। मंदिर के पुजारी ने वरुण गोस्वामी ने बताया कि यह मंदिर काफी पुराना है। खेरेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग को किसी व्यक्ति ने स्थापित नहीं किया है। यहां विराजमान शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है, जिसके कारण इस धाम को स्वंम्भू के नाम से भी जाना जाता है।

गुरु द्रोणाचार्य का आरायण वन हुआ करता था
शिवराज के खेरेश्वर धाम की मान्यता है कि द्वापर युग में यह गांव पहले गुरु द्रोणाचार्य का आरायण वन हुआ करता था। यहीं पर द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को शस्त्र विद्या सिखायी। मंदिर के महंत आकाश पुरी गोस्वामी कहते हैं कि वह 36 पीढ़ियों से खेरेश्वर महादेव की पूजा कर रहे हैं। मंदिर के पास द्रोणाचार्य की कुटिया बनी थी। महंत बताते हैं, मंदिर के पास में ही एक तालाब बना हुआ है। गांव वालों की ढेर सारे कमलों से भरे इस तालाब पर अटूट आस्था है। महंत बताते हैं?यह द्वापर युग का वही गंधर्व सरोवर है जहां यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल पूछे थे। इस तालाब में केवल सफेद रंग के कमल के फूल ही खिलते हैं। लोग दूर-दूर से यहां आकर सफेद कमल पुष्प भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना के लिए ले जाते हैं।

अश्वत्थामा हर रोज सबसे पहले जल चढ़ाने आते हैं
मंदिर के महंत आकाश पुरी गोस्वामी बताते हैं कि, द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी यहीं रहा करते थे। महंत के मुताबिक, महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने पांडवों के पुत्रों की छल से हत्या कर दी जिसके बाद भीमसेन ने अश्वत्थामा के माथे में लगी मणि निकालकर उसे शक्तिहीन बना दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया वह धरती पर तब तक पीड़ावश जीवित रहेगा जब तक स्वयं महादेव उसे उसके पापों से मुक्ति न दिला दें। तभी से ये कहा जाता है कि महादेव से मुक्ति की प्रार्थना के लिए यहां अश्वत्थामा हर रोज सबसे पहले जल चढ़ाने आता है। सावन के माह में ग्रामीणों ने कईबार उन्हें देखा है। रात के वक्त तेज रोशनी होती है और खड़ाऊं की आवाज सुनाई पड़ती हैं।

गंगा स्नान के बाद शिव को चढ़ाते हैं जल
शिवराजपुर निवासी राजू तिवारी बताते हैं कि, उन्होंने कईबार अस्वस्थामा को देखा है। उनका दावा है कि अश्वत्थामा आठ फुट लंबा है और खड़ाऊं पहनते हैं। सुबह के वक्त गंगा में स्नान के बाद वह मंदिर के अंदर जाते हैं। भगवान शिव को जल-फूल चढ़ाने के बाद गायब हो जाते हैं। राजू बताते हैं कि, चमत्कार की खोज को लेकर बड़े-बड़े साइंटिस्ट और मीडियावाले आए, लेकिन इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा पाए। राजू बताते हैं कि, खेरेश्वर धाम से करीब 100 मीटर की दूरी पर अश्वत्थामा का मंदिर भी बना है। गांव के लोग अश्वत्थामा को देव के रूप में पूजते हैं इसलिए उन्हें विशेष स्थान देने के लिये मंदिर में उनकी छोटी सी मूर्ति भी स्थापित की है।

सफेद लिबास में दिखते हैं अश्वत्थामा
मंदिर के आसपास रहने वाले पुजारी केशव प्रसाद शुक्ल, सरस्वती देवी और मधुबाला ने बताया कि उन्होंने कई बार सफेद लिबास में लंबे चौड़े इंसान को मंदिर आते-जाते देखा है। कुछ पूछने पर वह नहीं बोलता और तेज रोशनी के साथ गायब हो जाता है। भारतीय पौराणिक मान्यता अनुसार आठ चिरंजीवी- बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, मारकण्ये ऋषि, परषुराम, अश्वस्थामा हैं। इन सभी का सुबह-सुबह स्मरण करने से बीमारियां दूर होती हैं और मनुष्य सौ वर्षों तक जीता है। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा से बहुत प्रेम करते थे। शस्त्रों से संबंधित गुप्त रहस्य अश्वत्थामा ने अपने पिता से ही सीखे थे।

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