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Dussehra 2022 : यूपी के इस शहर में विराजमान है दशानन, साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं मंदिर के पट, जानें रावण को भक्त क्यों चढ़ाते हैं तरोई के फूल

कानपुर। बुराई पर अच्छाई का पर्व दशहरा  देश में बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जा रहा है। शहरों में रावण के पुतले खड़े हैं, जिनका दहन भगवान श्रीराम देरशाम करेंगे। इसबीच हम आपको दशानन के एक ऐसे मंदिर से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो साल में सिर्फ एक दिन खुलता है। देश-विदेश से भक्त यहां आते हैं और रावण की पूजा-अर्चना के साथ तरोई के फूल चढ़ाकर मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि, दशहरे के दिन स्वयं रावण यहां आता है और अपने भक्तों की मुरादें पूरी करता है।

मंदिर का इतिहास
शहर का हृदय स्थल कैलाश मंदिर शिवाला, जहां शक्ति के मंदिर के मध्य दशानन का भी मंदिर बना है। माता छिन्नमस्ता मंदिर के द्वार पर रावण का मंदिर है। बताया जाता हैं कि यहां पर स्व. गुरु प्रसाद शुक्ला करीब 155 साल पहले मां छिन्नमस्ता का मंदिर और कैलाश मंदिर की स्थापना कराई थी। रावण मंदिर के ट्रस्टी अनिरुद्ध प्रसाद बाजपेयी ने कहा कि दानव राजा का मंदिर कैलाश मंदिर परिसर में है। इसका निर्माण महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने करवाया था, जो उन्नाव के मूल निवासी थे। दशहरा के दिन मंदिर में पूजा करने और आरती में शामिल होने के लिए भारी भीड़ होती है।

शाम के बाद बंद हो जाते हैं मंदिर के पट
ट्रस्टी अनिरुद्ध प्रसाद बाजपेयी बताते हैं, दशनन मंदिर में इस वर्ष भी दशहरे के दिन सुबह 9ः00 से रावण की पूजा और आरती शुरू होकर शाम को रावण दहन तक चलेगी। राक्षस राजा का मंदिर छिन्नमस्तिका देवी मंदिर के बाहर बनाया गया है, क्योंकि माना जाता है कि रावण देवी का ’चौकीदार’ भी था। मंदिर के पुजारी धनंजय तिवारी कहते हैं, “लोग इस मंदिर में साल में एक दिन रावण के दर्शन के लिए आते हैं। दशहरे की शाम में रावण के पुतले में आग लगा दी जाती है, उसके बाद मंदिर का दरवाजा एक साल के लिए बंद कर दिया जाता है।

दर्शन से मन में बुराई नहीं पनपती
रावण मंदिर के बाहर फूल और माला बेचने वाले एक स्थानीय दुकान के मालिक रामराज कहते हैं, “यह आम धारणा है कि दशहरा के दिन रावण की आत्मा इस मंदिर में आती है। लोग मानते हैं कि रावण के दर्शन से मन में बुराई नहीं पनपती। पुजारी का कहना है कि रावण भगवान शिव की पूजा करने वाला सबसे बुद्धिमान और ज्ञानी राजाओं में से एक था, लेकिन सीता का अपहरण करने की उसकी बुरी मंशा के कारण उसका पतन हुआ। पुजारी के मुताबिक, जो भी भक्त दशहरा पर्व पर यहां आकर मन्नत मांगते है दशानन उनकी मुराद पूरी करते हैं।

इस वजह से दशहरे के दिन खुलते हैं मंदिर के पट
रावण शक्तिशाली होने के साथ प्रकांड विद्वान पंडित होने के साथ शिव और शक्ति का साधक था। रावण को इच्छा मृत्यु का वरदान था और अमरता प्राप्त थी, उसकी नाभि में अमृत था। भगवान श्रीराम ने जब उसकी नाभि को बाण से भेद दिया था तो दसकंधर धरती पर आ गिरा था लेकिन उसकी मृत्यु नहीं हुई थी। भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिए रावण के पास भेजा था। यही वजह है कि दशहरा के दिन रावण के मंदिर के पट खुलते हैं और लोग बल, बुद्धि, दीर्घायु और अरोग्यता का वरदान पाने के लिए जुटते हैं।

दीपक जलाने के साथ लोग पुष्प अर्पित कर साधना करते हैं
यहां लंकेश के दर्शन के लिए दूर-दूराज क्षेत्र से लोग आते है। विजय दशमी के दिन सुबह शिवाले में शिव का अभिषेक करने के बाद दसानन मंदिर में श्रृंगार के साथ दूध, दही, घृत, शहद, चंदन, गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद महाआरती होती है, जिसमें लोगों की भीड़ जुटती है। सुहागिनें शक्ति के साधक तरोई का पुष्प अर्पित करके अखंड सौभाग्य और संतान के लिए बल, बुद्धि और आरोग्य की कामना करती हैं। सरसों के तेल का दीपक जलाने के साथ लोग पुष्प अर्पित कर साधना करते हैं।

 

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