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जानिए कौन हैं नीलांबर-पीतांबर, जिन्होंने अपनी वीरता से अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे छक्के, आजादी के अमृत महोत्सव पर कानपुर में पहली बार मनाया जाएगा रणबांकुरों का शहादत दिवस

कानपुर। मसवानपुर स्थित बांके बिहारी गेस्ट हाउस में 25 दिसंबर को प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी वीर शहीद नीलाम्बर पीतांबर शाही भोगता का शहादत दिवस मनाया जाएगा। जिसको लेकर लोगों में खासा जोश है। प्रादेशिक खरवार सभा उत्तर प्रदेश कानपुर के जिलाध्यक्ष विजय सिंह खरवार ने बताया कि, जिस तरह आजादी की लड़ाई में दोनों भाइयों ने अपने प्राणों को बलि दे दी और अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया, हमें इनकी जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए। विजय सिंह खरवार बताते हैं, दोनों रणबांकुरों ने जिस तरह से देश के नाम अपना जीवन समर्पित कर दिया, उस तरह से वीरों को इतिहास के साथ ही सरकारों की तरफ से सहयोग नहीं मिला । अब खरवार समाज अपने देवताओं के बारे में आमजन को जानकारी देगी।

भारत के पहले मुक्तिकामी महासंग्राम के हीरो
1857 का सिपाही विद्रोह वस्तुतः ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत का पहला मुक्तिकामी महासंग्राम था। अकादमिक इतिहास की पुस्तकों में इस महासमर में पलामू की जनजातियों के योगदान को बहुत महत्व नहीं दिया गया जबकि नवीनतम शोध और दस्तावेजी सच्चाइयों से यह रहस्य उद्घाटित होने लगा है कि 1857 के संघर्ष के दो वर्ष तक पलामू की जनजातियां लगभग हारी हुई लड़ाई को लड़ती रही थीं। इस जनयुद्ध के नायक भोगता थे। भोगता जनजाति के दो सहोदर भाई पीतांबर साही और नीलांबर साही थे। जिन्होंने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी थी। जिन्हें न तो सरकारों ने महत्व दिया और न ही इतिहास के पन्नों में नुकीली कमल से ज्यादा लिखा गया। झारखंड के दो महान योद्धा की शहादत को कानपुर के लोग 25 दिसंबर को बड़ी धूम-धाम से मनाने जा रहे हैं।

पीतांबर-नीलांबर के पिता 12 गांवों के थे जमींदार
पीतांबर-नीलांबर के पिता भोगता के मुखिया चेमू सिंह की 12 गांवों की पुश्तैनी जमींदारी थी। कोल विद्रोह में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध सक्रियता के आरोप में अंग्रेजों ने चेमू सिंह की जमींदारी जब्त कर उन्हें निर्वासन में धकेल दिया था। इसी दौरान चेमू सिंह का निधन हो गया। पिता की अपमानजनक मृत्यु और अब फिरंगियों की गुलामी पीतांबर-नीलांबर के कलेजे में शूल की भांति धंस चुकी थी। तभी अंग्रेजों ने पलामू के चेरो राजा चुरामन राय को राजगद्दी से धकेलकर पलामू परगना को नीलाम कर खरीद लिया था। तब नीलांबर-पीतांबर ने चेरो और खरवार लोगों को अपने साथ जोड़ा और इस तरह अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध पलामू में चेरो-खरवार भोगता गठबंधन तैयार हो गया।

अंग्रेजों से नीलांबर-पीतांबर ने सीधा लिया मोर्चा
पलामू की ओर अग्रसर आजाद देसी पलटन और अंग्रेजी फौज के बीच चतरा में घमासान युद्ध हुआ था, जिसमें देसी पलटन की करारी हार हुई थी। पलामू अभियान की कमर टूट चुकी थी, लेकिन नीलांबर-पीतांबर परचम उठाए लोगों में स्वाधीनता का स्वाभिमान जगाते अंग्रेजी सत्ता से दो-दो हाथ करने निकल पड़े थे। नीलांबर के नेतृत्व में 10 हजार विद्रोहियों ने डालटनगंज से दो मील दक्षिण-पश्चिम स्थित ठकुराई रघुवर दयाल सिंह की चैनपुर स्थित हवेली को घेर लिया था। दोनों ओर से चार-पांच घंटे तक बेनतीजा गोलाबारी के बाद आक्रोशित विद्रोहियों ने कोयल नदी के तट पर स्थित शाहपुर किले पर धावा बोल दिया। किले के आग्नेयास्त्र लूट लिए। शाहरपुर थाना जला दिया गया था।

नीलांबर-पीतांबर गुरिल्ला युद्ध में माहिर
पलामू में नीलांबर-पीतांबर के आंदोलन की हाहाकारी शुरुआत हो चुकी थी। सीधी लड़ाई से बचते हुए नीलांबर-पीतांबर गुरिल्ला युद्ध लड़ रहे थे। नीलांबर के बेटे कुमार शाही ने सरदार परमानंद और भोज-भरत के साथ पलामू किले पर भी कब्जा कर लिया था। तिलमिलाए अंग्रेजों ने पूरी ताकत के साथ पलामू किले पर हमला बोल दिया। पलामू किले पर पुनः कब्जा करने के बाद डाल्टन ने लेस्लीगंज को मुख्यालय बनाकर नीलांबर-पीतांबर के दमन की तैयारी की। कर्नल टर्नर पलामू के जंगलों की खाक छानता रहा पर नीलांबर-पीतांबर का कोई सुराग नहीं मिल रहा था। खीज और क्रोध से उबलते टर्नर ने चेमो-सनेया पर आक्रमण कर दिया, लेकिन गुरिल्ला लड़ाकों के सामने कोई टिक नहीं सका।

निडर योद्धाओं से थर-थर कांपते थे अंग्रेज

टर्नर के बाद अंग्रजों ने दोनों भाईयों को पकड़ने के लिए अंग्रेज अफसर डाल्टन को लगाया। डाल्टन ने विद्रोही बंदी के सहयोग से 13 फरवरी 1858 को नीलांबर-पीतांबर के जन्मभूमि में प्रवेश किया। नीलांबर-पीतांबर का दल कोयल नदी पार करते अंग्रेजी सेना को देख चेमू गांव छोड़ जंगली टिलहों के पीछे छिपकर वार करने लगा। इस वार से रामगढ़ सेना का एक दफादार मारा गया। उसके बावजूद नीलांबर-पीतांबर को उस क्षेत्र से हटना पड़ा। दूसरी तरफ शाहपुर एवं बघमारा घाटी में डटे विद्रोहियों से भी अंग्रेजी सेना का मुकाबला हुआ। यहां भी विद्रोहियों को भारी क्षति उठानी पड़ी। विद्रोहियों के पास से 1200 मवेशी एवं भारी मात्रा में रसद अंग्रेजी सेना ने जब्त किए परंतु नीलांबर-पीतांबर बच निकलने में कामयाब रहे।

ऐसे पकड़े गए नीलांबर-पीतांबर
जासूसों की सूचना पर अंग्रेजी सेना ने पलामू में आंदालेन के सूत्रधार नीलांबर-पीतांबर को एक संबंधी के यहां से गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए ही 28 मार्च 1859 को लेस्लीगंज में फांसी दे दी। जिस समय नीलांबर-पीतांबर को अंग्रेज सरकार फांसी दी उस समय नीलांबर के एकमात्र बेटा साजन थे। साजन के चार पुत्र हुए। अलियार, रोवन, सोमारु और पूरन। इसमें अलियार व रोवन को एक-एक पुत्र हुआ। जबकि सोमारु व पूरन बेऔलाद थे। फिलहाल दोनों क्रांतिकारियों का परिवार गांव में रहता है। अभी वर्तमान में चरकू सिंह के पुत्र राजेंद्र सिंह, हरिचरण सिंह का पुत्र बिफन सिंह व कौलेश सिंह हैं, जो खेती किसानी कर अपना व परिवार का भरण पोषण करते हैं।

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