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दगंल के पहलवान से मुलायम सिंह यादव इस तरह से बने सियासत के ‘सुल्तान’ राजनीति के अखाड़े में बड़े-बड़ों को चित करने वाले ‘नेता जी’ की जिंदगी का पढ़ें ‘सफरनामा’

लखनऊ। समाजवादी पार्टी के सरंक्षक मुलायम सिंह यादव की हालत बहुत गंभीर है। उन्हें मेदांता के आईसीयू में रखा गया है। जहां डॉक्टर्स की टीम ‘नेता जी’ का इलाज कर रही है तो वहीं उनके चाहने वाले मंदिर में जाकर माथा टेक रहे हैं। दंगल के ‘पहलवान’ जब राजनीति में आए तो ‘सुल्तान’ बनकर छा गए। उत्तर प्रदेश की राजनीति पिछले चार दशक से इन्हीं के इर्द-गिर्द घुमती रही। देश के वह इकलौते नेता हैं जिन्हें जनता के साथ अन्य सियासतदान नेता जी के नाम से पुकारते हैं। ऐसे में हम आपको सबके चहेते और किसान, गरीब व पिछड़ों के नेता जी की जिंदगी के सफरनामें से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं। कैसे एक किसान का बेटा, सूबे की सियासत में चमका और बड़े-बड़े धुरंधरों को पटखनी देकर मंत्री, मुख्यमंत्री और रक्षामंत्री बना।

1939 को हुआ था मुलायम सिंह का जन्म 
22 नवंबर 1939 को इटावा जिले के सैफई में जन्मे मुलायम सिंह की पढ़ाई-लिखाई इटावा, फतेहाबाद और आगरा में हुई। मुलायम कुछ दिनों तक मैनपुरी के करहल स्थति जैन इंटर कॉलेज में प्राध्यापक भी रहे। पांच भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर मुलायम सिंह की दो शादियां हुईं। पहली पत्नी मालती देवी का निधन मई 2003 में हो गया था। यूपी के मौजूदा सीएम अखिलेश यादव मुलायम की पहली पत्नी के बेटे हैं। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता हैं, जिनका इंतकाल 2022 में हो गया। साधना गुप्ता से मुलायम के बेटे प्रतीक यादव हैं। मुलायम सिंह को सियायत का सुल्तान कहा जाता है। मुलायम के चलते यूपी से कांग्रेस का सूफड़ा साफ हो गया और एक वक्त ऐसा भी आया, जब नेता जी ने बीजेपी की सियासी जमीन को अपने बनाए चक्रव्यूह से पूरी तरह से जमींदोज कर दिया।

नत्तूसिंह राजनीति में लाए
मुलायम सिंह यादव के पिता सुधर सिंह उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। लेकिल पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में मुलायम सिंह ने प्रभावित कर लिया। यहीं से उनका राजनीतिक सफर भी शुरू हो गया। उन्होंने नत्थूसिंह के परंपरागत विधान सभा क्षेत्र जसवंतनगर से अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की। राम मनोहर लोहिया और राज नरायण जैसे समाजवादी विचारधारा के नेताओं की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले मुलायम 28 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने। जबकि उनके परिवार का कोई सियासी बैकग्राउंड नहीं था। ऐसे में मुलायम के सियासी सफर में 1967 का साल ऐतिहासिक रहा जब वो पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। उन्होंने जसवंत नगर सीट से प्रचंड जीत दर्ज की थी।

1989 में पहली बार बने यूपी के मुख्यमंत्री
मुलायम सिंह यादव 1980 के आखिर में उत्तर प्रदेश में लोक दल के अध्यक्ष बने थे जो बाद में जनता दल का हिस्सा बन गया। मुलायम 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश के सीएम बने। नवंबर 1990 में केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिर गई तो मुलायम सिंह चंद्रशेखर की जनता दल (समाजवादी) में शामिल हो गए और कांग्रेस के समर्थन से सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे। अप्रैल 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो मुलायम सिंह की सरकार गिर गई। 1991 में यूपी में मध्यावधि चुनाव हुए जिसमें मुलायम सिंह की पार्टी हार गई और बीजेपी सूबे में सत्ता में आई। बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने के लिए मुलायम सिंह ने साइकिल यात्रा शुरू की। गांव-गांव जाकर समाजवाद को लोगों तक पहुंचाया। मुलायम सिंह को पता था कि, बीजेपी को सिर्फ सपा ही हरा सकती है। ऐसे में उन्होंने खुद की पार्टी बनाने का ऐलान किया।

1992 में बनाई समाजवादी पार्टी
चार अक्टूबर, 1992 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा की। नवंबर 1993 में यूपी में विधानसभा के चुनाव होने थे। सपा मुखिया ने बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ कर लिया। समाजवादी पार्टी का यह अपना पहला बड़ा प्रयोग था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पैदा हुए सियासी माहौल में मुलायम का यह प्रयोग सफल भी रहा। कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से मुलायम सिंह फिर सत्ता में आए और सीएम बने। मुलायम सिंह यादव को पता था कि, रातनीति में लंबी पारी अगर खेलनी है तो समय के वक्त रणनीति बनानी होगी। मुलायम सिंह की नजर दिल्ली पर टिक गई और उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।

देश के बने रक्षामंत्री
1996 में मुलायम सिंह यादव 11वीं लोकसभा के लिए मैनपुरी सीट से चुने गए। उस समय केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो उसमें मुलायम भी शामिल थे। मुलायम देश के रक्षामंत्री बने थे। हालांकि, यह सरकार बहुत लंबे समय तक चली नहीं। मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने की भी बात चली थी। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में वे सबसे आगे खड़े थे, लेकिन लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने उनके इस इरादे पर पानी फेर दिया। बावजूद मुलायम सिंह यादव ने हिम्मत नहीं हारी। वह दिल्ली से आकर यूपी में फिर से सक्रिय हो गए। समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिए अपने भाई शिवपाल यादव और बेटे अखिलेश यादव के साथ जुट गए।

2012 में अखिलेश को बनाया मुख्यमंत्री
2003 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जीत नसीब हुई। 29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव एक बार फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह सरकार चार साल ही रह पाई। 2007 में विधानसभा चुनाव हुए मुलायम सिंह सत्ता से बाहर हो गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हालत खराब हुई तो मुलायम सिंह ने बड़ा फैसला लिया। राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष की कुर्सी पर छोटे भाई शिवपाल यादव को बिठा दिया और खुद दिल्ली की सियासत की कमान संभाल ली। 2012 के चुनाव से पहले नेताजी ने अपने बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश सपा की कमान सौंपी। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा के पक्ष में अप्रत्याशित नतीजे आए। नेताजी ने बेटे अखिलेश को सूबे के सीएम की कुर्सी सौंप दी और समाजवादी पार्टी में दूसरी पीढ़ी ने दस्तक दी।

मुजफ्फरनगर कांड
2 अक्टूबर 1994 को अलग उत्तराखंड की मांग को लेकर लोग दिल्ली रैली में शिरकत करने जा रहे थे। उत्तर प्रदेश में उस वक्त मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। बताया जाता है कि सीएम मुलायम के आदेश पर इन लोगों को मुजफ्फरनगर के पास रामपुर तिराहे पर घेर लिया गया। इस दौरान पुलिस ने आंदोलनकारियों पर न सिर्फ लाठी-डंडे बरसाए बल्कि फायरिंग भी हुई. इस घटना को रामपुर तिराहा गोलीबारी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना में 6 लोग मारे गए। कुछ महिलाओं के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म के आरोप भी लगे थे। इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में मातम और अफरातफरी का माहौल फैल गया। इस घटना के बाद मुलायम सिंह यादव की इमेज एक ’विलेन’ जैसी हो गई थी। आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा भी चला, लेकिन पीड़ितों को न्याय नहीं मिला। बताया जाता है कि, उस वक्त पूरे उत्तराखंड में मुलायम सिंह यादव को लेकर लोगों में जबरदस्त आक्रोश था।

गेस्ट हाउस कांड
2 जून 1995 को लखनऊ में हुआ स्टेट गेस्ट हाउस कांड मुलायम सिंह के सियासी करियर पर सबसे बड़ा दाग है। उस वक्त बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती से साथ हुए दुर्व्यवहार की वजह से मुलायम अगले दिन ही सत्ता से बेदखल हो गए। दरअसल, 1993 के यूपी चुनाव में बसपा और सपा में गठबंधन हुआ था, जिसकी बाद में जीत हुई। मुलायम सिंह यूपी के सीएम बने। लेकिन, आपसी खींचतान के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। नाराज सपा के कार्यकर्ताओं ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंच कर मायावती को घेर लिया। इस दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें मारपीट कर बंधक बना लिया। मायावती ने अपने आप को बचाने के लिए कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था। करीब 9 घंटे बंधक बने रहने के बाद बीजेपी नेता लालजी टंडन ने अपने समर्थकों से साथ वहां पहुंचकर मायावती को वहां से सुरक्षित निकाला।

आय से अधिक संपत्त्त्ति के मामले अदालतों में चले
मुलायम सिंह यादव और उनका परिवार पर आय से अधिक संपत्त्त्ति के मामले अदालतों में चले। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि 1977 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने थे, तब से लेकर 2005 तक उनकी संपत्ति करीब 100 गुना ज्यादा बढ़ गई थी। ऐसे में इस बात की जांच होनी चाहिए कि आखिर इतनी संपत्ति उन्होंने और उनके परिवार ने कैसे अर्जित कर ली। शुरू में इस मामले में तो मुलायम सिंह के साथ उनके बेटे अखिलेश यादव, बहू डिंपल यादव, दूसरे बेटे प्रतीक यादव भी आरोपी थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने डिंपल यादव को जांच के दायरे से ये कहते हुए बाहर कर दिया था कि वो उस समय सार्वजानिक पद पर नहीं थीं। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी है।

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