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सरकार की सहमति से लोगों के जेबों पर ड़ाका डाल रही है रेलवे

दिनेश सिंह, गाजियाबाद

Gaziabad: करोना ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया। सर्वेक्षण कहते हैं कि करोड़ों लोग बेरोजगार हुए है। कई लोगों ने मोदी जी के थाली ताली के भ्रम में फंसकर एकायक घोषित लॉकडाउन में हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा की। लेकिन रेलवे एक ऐसा विभाग है। जिसके चक्के नहीं रुके पूरे कोविड-19 गाड़ी धुआंधार दौडी।

“स्पेशल के नाम पर प्रदेश सरकारों के हर्जे-खर्चे पर यात्री धुलाई भी की। नाम हुआ जनसेवा का। जब ट्रक के पहिए थमे रहे तो मालगाड़ी ही एकमात्र साधन रही। लेकिन अब सब कुछ खुल गया है कहा जाता है कि जब चुनाव, रैली, जनसभा, विद्यालय और प्रार्थनास्थल खुल जाए तो समझो कि प्रतिबंध का अंत हुआ।”

अभी मोदी जी घोषित रैली के लिए कई स्टेट की पब्लिक ढोकर यही प्रशासन इकट्ठा कर देगा। इसी कोरोना में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव हुए। सच कहा जाय तो करोना की दूसरी लहर में इन चुनावों ने मुख्य भूमिका अदा की। लेकिन कौन कहें, इन सरकारों के कार्यनामों को। लगता है रेलवे को क्या वाकई में कोरोना हो गया है, जो क्लोन ट्रेन चला सकता है। स्पेशल के नाम पर जनता को लूट सकता है। रियायती टिकट बंद कर सकता है। कारण कोविड में यात्रा करने से हतोत्साहित करने के लिए यात्री सुविधाओं में कटौती की गई है। कितना सुंदर कारण गिनाता है रेलवे, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई बहुत ही कड़वी और घिनौनी है। किराया ज्यादा, वेडरोल बंद और खाना बंद, जबकि बैकडोर से पाइवेट वेंडर लंबी दूरी की ट्रेनों में खानपान के नाम पर अंधी काट रहें हैं। मोदी सरकार की नीयत परोपकार की नहीं है। ये लोकहित की सरकार नहीं है। हर नागरिक सुविधाओं पर वसूली, सड़क पर चलो तो टोल, पेट्रोल-डीजल के क्या कहने, वाशरूम का प्रयोग किया तो दाम के साथ जीएसटी, प्लेटफार्म पर चढ़े तो 50 रुपये

शुक्र है उन पूर्ववर्ती सरकारों की जो जनता के हितों के लिए घाटे की रेल चलाई। जिस समयसारणी से रेल का शुभारंभ हुआ। उस पर नियमित रेल चली। चाहे उस रूट पर पूरे पैसेंजर मिले या ना मिले। क्योंकि रेलवे की दलील थी कि उन मुसाफिरों को भी गंतव्य तक पहुंचाना है जो इस ट्रेन के इंतजार में हैं। रेलवे एवं डाक सेवा लोगों की जरूरत थी। लेकिन मोदी सरकार ने रेलवे को प्राइवेट संस्थान बना दिया। जहां जरूरत के हिसाब रेट तय होते हैं। कई वीआईपी ट्रेनों में फ्लेक्सी फेयर लागू कर दिया। यदि किसी रूट पर पैसेंजर कम मिले तो संरक्षा के नाम पर या किसी अन्य कारण से ट्रेन सेवा रद्द कर दी जाती है। चाहे उस रूट पर कितने ही आवश्यक यात्री फंसे हो। गए वो दिन जब रेलवे आम गरीब की रेल हुआ करती थी। करोना की आड़ में रेलवे ने अपने मुखोटे को बदल दिया है। पैसेंजर सेवा अपनी पूरी क्षमता से नहीं चल रही है। यात्री जनरल ट्रेन का किराया 6 गुना यानी 30रु से शुरू होता है जो मात्र 5 रु से शुरू होता था। आज हालत यह है कि प्लेटफार्म टिकट जो 6 साल पहले 3 रु का था आज 50रु का हो गया है वह भी मात्र 2 घंटे के लिए। देश को बुलेट ट्रेन तो नहीं मिली। लेकिन मोदी सरकार ने 3 रू से 50 रु का सफर मात्र 6 साल में ही पूरा कर लिया। यानी लगभग 170% की बढ़ोतरी एक पंचवर्षीय योजना में अब अंदाजा लगाइए कि गरीबों के नाम की दुहाई देती मोदी सरकार क्या वाकई गरीबों की सरकार है। आखिर 50 रु का टिकट कोई इंडस्ट्रीज या व्यापारी से नहीं वसूल रहे हैं। क्योंकि वह हवाई जहाज का यात्री है। रेल पर गरीब एवं मध्यम वर्ग ही चलता है। आखिर किसकी जेब काट रही है यह सरकार। तत्काल टिकट के दामों में बढ़ोतरी, रेलवे रिजर्वेशन के बेस प्राइस में बढ़ोतरी, रिजर्वेशन कैंसिलेशन चार्जेस में बढ़ोतरी, प्लेटफॉर्म टिकट का आलम देख चुके, एमएसटी धारक दैनिक यात्रियों की जेबों पर डाका डाल रही है। यह सरकार।  एमएसटी धारक पूंजीपति नहीं है। उनके साथ खुली लूट उस पर भी पूरी क्षमता से रेल यानी पैसेंजर ट्रेनों की संख्या एवं फेरों में कमी कर दी गई है।

विचारणीय है कि भाजपा सरकार यह दुस्साहस इसलिए कर पा रही है। क्योंकि उसे आजादी के बाद से अब तक का सबसे कमजोर और बिखरा हुआ दिग्भ्रमित विपक्ष मिला है। एक तरह से विपक्ष खुद में दिवालिया हो गया है बिखर गया है। थोड़ी बहुत इलेक्शन में चेतना आती है तो जातिवाद, धर्म वाद, कर्म वाद, वाद में वाद पैदा कर फिजूल के मुद्दों में भ्रमित विपक्ष असली मुद्दे से भटक जाता है। जिसका फायदा भाजपा यानी मोदी सरकार को मिलता है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी खुद में भी एक मुद्दा बनकर रह गई है। जिसके 23 गण पार्टी नेतृत्व के इलाज का हल ढूंढ रहे हैं।

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